राष्ट्रवाणी, 09 अगस्त 2026 । गरियाबंद जिले के आदिवासी बालक आश्रमों और छात्रावासों में लंबे समय से दैनिक वेतन पर काम कर रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण की उम्मीद फिर जगी है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित विभाग को इन कर्मचारियों के सेवा रिकॉर्ड की तुलना उन कर्मचारियों से करने का निर्देश दिया है, जिन्हें वर्ष 2022 और 2024 में नियमित किया गया था।
कोर्ट ने कहा है कि यदि रिकॉर्ड की जांच में याचिकाकर्ताओं की सेवा स्थिति, योग्यता, पद और अन्य शर्तें नियमित किए गए कर्मचारियों के समान पाई जाती हैं, तो उन्हें भी उसी तारीख से नियमितीकरण का लाभ दिया जाए।
न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने लोचन प्रसाद पांडव समेत अन्य कर्मचारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर पूरी करने को कहा है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि वे गरियाबंद जिले के विभिन्न आदिवासी बालक आश्रमों और छात्रावासों में लंबे समय से दैनिक वेतन कर्मचारी के रूप में काम कर रहे हैं। उनके समान पद और योग्यता रखने वाले कई कर्मचारियों को नियमित किया जा चुका है, लेकिन उन्हें इसका लाभनहीं दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि समान परिस्थितियों में काम करने वाले कर्मचारियों को नियमितीकरण का लाभ देना और उन्हें इससे वंचित रखना समानता के अधिकार के विपरीत है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के नरेंद्र कुमार तिवारी बनाम झारखंड राज्य मामले में स्थापित कानूनी सिद्धांतों का भी उल्लेख किया गया।
कोर्ट के सामने यह तथ्य रखा गया कि 5 मार्च 2008 के सरकारी सर्कुलर के आधार पर विभाग ने समान स्थिति वाले कई कर्मचारियों को नियमित किया था। इनमें कुछ कर्मचारियों को 28 फरवरी 2022 और अन्य को 18 अक्टूबर 2024 को नियमितीकरण का लाभदिया गया।
हाईकोर्ट ने अब विभाग को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ताओं और इन नियमित कर्मचारियों के सेवा रिकॉर्ड की वास्तविक तुलना करे। यदि दोनों की स्थिति समान पाई जाती है तो याचिकाकर्ताओं को भी पिछली समान तारीख से नियमितीकरण का लाभ दिया जाएगा।
