राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, बिलासपुर: हाई कोर्ट ने करीब 34 साल पुराने आपराधिक मामले में डाक विभाग के तत्कालीन कर्मचारी के खिलाफ शुरू हुई कार्यवाही पर फिलहाल रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। साथ ही अंबिकापुर के विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) की अदालत में लंबित विशेष आपराधिक प्रकरण की आगे की कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। मामला मनोहरलाल चौधरी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने अंबिकापुर थाने में वर्ष 1992 में दर्ज एफआइआर को रद करने की मांग की है। एफआइआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 और 34 के तहत अपराध दर्ज किया गया था। याचिकाकर्ता ने इसके साथ ही 23 जून 2026 को दाखिल चार्जशीट क्रमांक 255-ए/2026 और विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट), अंबिकापुर द्वारा विशेष आपराधिक प्रकरण क्रमांक 03/2026 में लिए गए संज्ञान को भी अपने संबंध में चुनौती दी है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रियंका राय ने बताया कि घटना के समय मनोहरलाल चौधरी डाक सहायक के पद पर कार्यरत थे। उनके अनुसार उन्होंने केवल अपने आधिकारिक कर्तव्य के तहत बचत खाता खोला था। कथित जालसाजी या मुआवजा चेक की राशि को फर्जी तरीके से बढ़ाने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन की ओर से उपलब्ध दस्तावेज में ऐसा कोई आरोप नहीं है, जिससे याचिकाकर्ता की कथित धोखाधड़ी या जालसाजी में प्रत्यक्ष भूमिका सामने आए। शीट याचिकाकर्ता की ओर से हाई कोर्ट को बताया गया कि एफआईआर वर्ष 1992 में दर्ज हुई थी, लेकिन उनके खिलाफ तीन दशक से अधिक समय तक चार्जशीट दाखिल नहीं की गई। बचाव पक्ष के अनुसार हाई कोर्ट ने बाद में दूसरी याचिका में जांच पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद करीब 34 साल पुराने मामले में 23 जून 2026 को जल्दबाजी में चार्जशीट दाखिल की गई। याचिकाकर्ता ने इतनी लंबी देरी को लेकर भी आपत्ति जताई और कहा कि इस अवधि में अभियोजन की ओर से कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। 2016 की अभियोजन स्वीकृति में भी नाम या आरोप नहीं याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अभियोजन स्वीकृति से संबंधित दस्तावेज में भी उनके खिलाफ कोई स्पष्ट आरोप नहीं है। बचाव पक्ष के अनुसार 8 जून 2016 की अभियोजन स्वीकृति में याचिकाकर्ता के खिलाफ कथित अपराध में भूमिका का उल्लेख नहीं किया गया है। इसी आधार पर हाई कोर्ट से एफआईआर, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को उनके संबंध में रद्द करने की मांग की गई। मामले की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता आशीष शुक्ला उपस्थित हुए। उन्होंने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। हाई कोर्ट ने राज्य को एक सप्ताह और कोई अतिरिक्त समय नहीं देते हुए जवाब प्रस्तुत करने का अवसर दिया।

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