राष्ट्रवाणी: आशुतोष तिवारी, जगदलपुर। बस्तर में गरीबों की थाली तक पहुंचने वाला सरकारी राशन आखिर किसके इशारे पर बाजार में बेचा जा रहा है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि पीडीएस के चावल की अवैध खरीद-फरोख्त का एक और मामला सामने आया है। केशलूर से पिकअप में भरकर ले जाए जा रहे पीडीएस चावल को सूचना मिलने पर पकड़कर कोतवाली थाने लाया गया, जिसके बाद खाद्य विभाग ने जांच शुरू कर दी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर राशन दुकानों से सरकारी चावल खुले बाजार तक पहुंच रहा है तो जिम्मेदार कौन है? क्या यह केवल एक व्यापारी का खेल है या इसके पीछे पूरा नेटवर्क सक्रिय है? यदि इस मामले की निष्पक्ष और गहराई से जांच हुई तो कई और बड़े नाम सामने आ सकते हैं। वहीं पूरे मामले में जिला प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि संपर्क करने की कोशिश के बावजूद कलेक्टर का पक्ष सामने नहीं आ सका। खाद्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, प्रेस से सूचना मिलने के बाद मौके पर पहुंचकर बोलेरो पिकअप की जांच की गई, जिसमें लगभग 25 से 30 बोरी पीडीएस का चावल मिला है। बारिश के कारण तत्काल बोरियों की गिनती नहीं हो सकी, लेकिन गाड़ी सहित पूरे माल को जब्त कर आगे की वैधानिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है। प्राथमिक जांच में अधिकारी ने बताया कि यह चावल पीडीएस का है और सुनील गुप्ता नामक किराना व्यापारी द्वारा इसकी खरीद-बिक्री किए जाने की जानकारी सामने आई है। अधिकारी ने यह भी बताया कि संबंधित व्यापारी के विरुद्ध पूर्व में भी कार्रवाई हो चुकी है। उनका प्रतिष्ठान सील किया गया था, जिसे बाद में कलेक्टर न्यायालय के आदेश पर जुर्माना लगाकर खोला गया था। खाद्य विभाग का कहना है कि पीडीएस चावल का अवैध व्यापार और परिवहन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शासन की मंशा है कि बीपीएल और पात्र हितग्राहियों तक उनका हक का राशन पहुंचे, इसलिए इस मामले में कड़ी कार्रवाई की जाएगी, लेकिन इस कार्रवाई के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि सरकारी राशन दुकानों से चावल बाहर निकल रहा है तो उसकी जवाबदेही किसकी है? क्या यह केवल एक वाहन पकड़ने तक सीमित रहेगा या फिर उन राशन दुकानों और बिचौलियों तक भी जांच पहुंचेगी जहां से गरीबों के हिस्से का अनाज बाजार में पहुंच रहा है? बस्तर में यह पहला मामला नहीं है। समय-समय पर पीडीएस चावल की अवैध बिक्री के आरोप सामने आते रहे हैं। कई हितग्राही यह शिकायत भी करते हैं कि उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि इस महीने राशन नहीं आया, जबकि वही चावल खुले बाजार में बिकता दिखाई देता है। अब देखने वाली बात होगी कि यह कार्रवाई केवल औपचारिकता साबित होती है या फिर पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश कर उन लोगों पर भी सख्त कार्रवाई होगी, जो गरीबों के हक के अनाज को मुनाफे का जरिया बना रहे हैं।

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