राष्ट्रवाणी: वीरेंद्र गहवई, बिलासपुर। हाईकाेर्ट ने नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि पीड़िता नाबालिग है तो उसके साथ बनाए गए शारीरिक संबंधों में उसकी कथित आपसी सहमति का कोई कानूनी औचित्य नहीं है। कोर्ट ने बस्तर जगदलपुर के सत्र न्यायालय द्वारा आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराते हुए सुनाई गई 7 वर्ष के सश्रम कारावास और 500 रुपए जुर्माने की सजा को सही ठहराया है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपी द्वारा दायर दोनों अपीलों को खारिज कर दिया है। साथ ही दुष्कर्म के आरोपी का बेल बॉन्ड रद्द कर हिरासत में लेकर जेल भेजने का आदेश दिया है। दरअसल बस्तर जिले में मिडिल स्कूल में पढ़ने वाली छात्रा के माता-पिता आजीविका की तलाश में पड़ोसी गांव गए हुए थे। इस दौरान आरोपी टीवी देखने के बहाने उनके घर आता था और किशोरी का शारीरिक शोषण करता था। होली त्योहार पर जब माता-पिता घर लौटे तो किशोरी की तबीयत खराब रहने लगी। अस्पताल ले जाने पर डाक्टरों ने जांच के बाद उसके 5 माह के गर्भवती होने की पुष्टि की। इसके बाद किशोरी ने परिजनों को आपबीती सुनाई। 12 मार्च 2009 को गांव में पंचायत बुलाई गई, जहां आरोपी और उसके परिजनों ने जुर्म कबूल कर लड़की को अपने घर में रखने और पुलिस में रिपोर्ट न करने का वादा किया। कुछ ही दिनों बाद आरोपी के परिवार ने लड़की को घर से भगा दिया, जिसके बाद पीड़िता के पिता ने 28 मार्च 2009 को थाने में एफआईआर दर्ज कराई। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट के समक्ष पैरवी करते हुए कहा, घटना के 7 महीने बाद एफआईआर दर्ज कराई गई और इस अत्यधिक देरी का कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया गया। अस्थि टेस्ट के अलावा ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे पीड़िता की उम्र 16 वर्ष से कम साबित हो। अधिवक्ता ने कहा, दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे, इसलिए रेप का अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने रिकॉर्ड और मेडिकल साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज कर दिया। दाखिला पंजी, सर्टिफिकेट के अनुसार पीड़िता की जन्म तिथि 16 जनवरी 1996 दर्ज थी। रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट में भी उसकी उम्र 15 वर्ष से कम पाई गई थी। चिकित्सीय जांच में उम्र लगभग 13 वर्ष बताई गई। अदालत ने माना कि गवाहों के बयानों से भले ही यह प्रतीत होता हो कि संबंध आपसी रजामंदी से बने थे, लेकिन चूंकि पीड़िता कानूनन नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति की कोई कानूनी मान्यता नहीं है।

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