राष्ट्रवाणी: अमित पांडेय, खैरागढ़। राजनांदगांव–खैरागढ़ मार्ग पर ग्राम गोपालपुर में भगवान श्रीगणेश का एक ऐसा मंदिर है, जिसकी पहचान सिर्फ धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि अपनी अनोखी परंपराओं और स्थानीय इतिहास से जुड़ी मान्यताओं के कारण भी है। यहां भगवान गणेश की आठ भुजाओं वाली प्राचीन पाषाण प्रतिमा विराजमान है।
ग्रामीण इसे स्वयंभू स्वरूप मानते हैं। इस प्रतिमा को लेकर कई ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं, जिन्हें सुनकर श्रद्धालुओं की जिज्ञासा बढ़ जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार कभी यह प्रतिमा खुले आसमान के नीचे नीम के पेड़ के नीचे विराजमान थी।
मंदिर बनने के बाद इसे भीतर स्थापित करने की कोशिश हुई, लेकिन उस दौरान जो हुआ, वह आज भी गोपालपुर में चर्चा का विषय है। स्थानीय जानकार भागवतशरण सिंह बताते हैं कि वर्ष 2006 में मंदिर निर्माण के दौरान नीम के पेड़ के नीचे स्थापित गणेश प्रतिमा को मंदिर के भीतर ले जाने का प्रयास किया गया था।
उनके अनुसार करीब 25 युवकों ने मिलकर प्रतिमा को उठाने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिली। भागवतशरण सिंह के मुताबिक इसके बाद मंदिर के तत्कालीन सेवक को स्वप्न आने की बात सामने आई। इसके बाद प्रतिमा को मंदिर में स्थापित किया जा सका।
प्रतिमा के नहीं उठने का यह प्रसंग आज भी स्थानीय लोगों के बीच आस्था से जुड़ी लोकमान्यता के रूप में बताया जाता है। गोपालपुर और समीपस्थ सिंगारपुर का संबंध स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं में खैरागढ़ के राजवंशीय इतिहास से जोड़ा जाता है। स्थानीय जानकारी के अनुसार करीब 1700 के आसपास सिंगारपुर परगना खैरागढ़ से जुड़ा था और यह क्षेत्र राजा टिकैतराय के शासनकाल से संबंधित बताया जाता है।
अष्टभुजी गणेश प्रतिमा को लेकर स्थानीय मान्यता है कि वर्ष 1884 में नागवंशी शासक उमराव सिंह के काल में इसकी स्थापना हुई थी। इसके बाद सूबेदार ठाकुर प्रकाश सिंह गहरवार और उनके वंशज प्रतिमा की सेवा-पूजा की परंपरा से जुड़े रहे। बटुक सिंह, तोप सिंह और युधिष्ठिर सिंह सहित उनके वंशजों के नाम भी इस परंपरा से जोड़े जाते हैं।
इस वंशावली और राजवंशीय इतिहास का विस्तार नागवंश कुलभूषण लाल प्रद्युम्न सिंह की पुस्तक ‘नागवंश’ में होने की बात स्थानीय स्तर पर बताई जाती है। गोपालपुर के अष्टभुजी गणेश मंदिर की एक और खास परंपरा है। यहां गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक 11 दिनों तक उत्सव मनाया जाता है, लेकिन अनंत चतुर्दशी के दिन प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता।
इसके बजाय भगवान श्रीगणेश को दो बाल्टी पानी से स्नान कराया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद इसी के साथ गणेशोत्सव का समापन होता है। ग्रामीणों का कहना है कि यहां सदियों से पाषाण स्वरूप में विराजमान गणेश की ही पूजा की जाती है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक एक बार गणेश चतुर्थी पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। इसके बाद संबंधित महिला की मृत्यु हो गई। ग्रामीणों ने इस घटना को अपनी धार्मिक मान्यता से जोड़कर देखा और इसके बाद यहां मिट्टी की गणेश प्रतिमा स्थापित नहीं करने की परंपरा और मजबूत हो गई।
हालांकि यह घटना स्थानीय लोकमान्यता है, इसका स्वतंत्र ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण होने का दावा नहीं किया जा रहा है। अष्टभुजी गणेश प्रतिमा को लेकर एक और मान्यता स्थानीय स्तर पर प्रचलित है। ग्रामीणों के अनुसार एक समय प्रतिमा को सिंगारपुर ले जाने का प्रयास किया गया था।
इसके लिए प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखने की कोशिश की गई, लेकिन प्रतिमा बैलगाड़ी में रखी ही नहीं जा सकी। इसके बाद उसे वहीं रहने दिया गया। आज भी यहां परंपरा के अनुसार एक ही प्राचीन अष्टभुजी गणेश प्रतिमा की पूजा की जाती है।
गोपालपुर का अष्टभुजी गणेश मंदिर इसलिए खास है क्योंकि यहां धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय इतिहास और लोकपरंपराएं भी जुड़ी हुई हैं। करीब 1700 से जुड़े सिंगारपुर खैरागढ़ के ऐतिहासिक संदर्भ, 1884 में प्रतिमा स्थापना की स्थानीय मान्यता, आठ भुजाओं वाला पाषाण स्वरूप, 2006 में 25 युवकों द्वारा प्रतिमा उठाने की कोशिश का प्रसंग और विसर्जन की जगह स्नान कराने की परंपरा ये सभी बातें इस मंदिर को अलग पहचान देती हैं।
इनमें से कई प्रसंग स्थानीय मान्यताओं और मौखिक परंपराओं पर आधारित हैं। इनके ऐतिहासिक पक्ष की पुष्टि के लिए प्राथमिक दस्तावेजों और पुरातात्विक प्रमाणों का अध्ययन अलग विषय है। लेकिन स्थानीय लोगों के लिए गोपालपुर के अष्टभुजी गणेश सिर्फ एक प्रतिमा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का जीवंत केंद्र हैं।
