राष्ट्रवाणी: हल्दीराम (Haldiram) की कहानी 1937 में गंगा बिशन अग्रवाल द्वारा बीकानेर में एक छोटी दुकान से शुरू हुई, जिसने अपनी अनूठी भुजिया से पहचान बनाई। कैसे हुई थी Haldiram की शुरुआत ? (ai photo) संस्थापक गंगा बिशन अग्रवाल ने 1937 में बीकानेर में नींव रखी।
‘मोठ’ के उपयोग से भुजिया को मिला अनूठा और बेजोड़ स्वाद। आज 85,000 करोड़ की वैल्यूएशन, भारत का नंबर-1 स्नैक्स ब्रांड। बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: हमारे देश में कई ऐसी पुरानी कपंनियां हैं, जिनका आज भी बोल-बाला है।
आज भी इन कंपनीज के प्रोडक्ट लोगों की पहली पसंद हैं, इसके साथ ही हर कंपनी के कामयाबी की एक अलग कहानी हैं। खाने-पीने के ब्रांड की बात करें तो जिस ब्रांड की बात आज हम कर रहे हैं वो हर भारतीय के घर में आपको जरूर मिलेगा। इस कंपनी का नाम है हल्दीराम (Haldiram Success Story)।
आज हल्दीराम सिर्फ एक नमकीन का पैकेट नहीं, बल्कि हर भारतीय घर का एक अटूट हिस्सा बन चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हल्दीराम (Haldiram History) को किसने और कब शुरू किया था? आइए जानते हैं हल्दीराम की दिलचस्प कहानी।
हल्दीराम ब्रांड की कहानी आज से करीब 89 साल पहले, 1937 में शुरू हुई थी। इसके संस्थापक गंगा बिशन अग्रवाल थे, जिन्हें लोग प्यार से ‘हल्दीराम’ कहकर बुलाते थे। इसी उपनाम के साथ उन्होंने अपने कारोबार की नींव रखी, जो आज पूरी दुनिया में एक ग्लोबल ब्रांड बन चुका है।
हल्दीराम ब्रांड के संस्थापक गंगा बिशन अग्रवाल ने राजस्थान के बीकानेर स्थित एक छोटी सी दुकान से अपने व्यवसाय की नींव रखी थी। शुरुआत में उन्होंने पारंपरिक तरीके से बेसन की भुजिया बनाई, लेकिन मनमुताबिक स्वाद न मिलने पर उन्होंने अपनी रेसिपी में बदलाव किया। उन्होंने बेसन के स्थान पर ‘मोठ’ का उपयोग किया, जिसने भुजिया को एक ऐसा बेजोड़ स्वाद दिया जो आज इस ग्लोबल ब्रांड की सबसे बड़ी पहचान है।
नए प्रयोगों से तैयार हुई यह भुजिया पहले से कहीं ज्यादा कुरकुरी और स्वादिष्ट थी। आज तो बाजार में इसके दर्जनों फ्लेवर मौजूद हैं। देखते ही देखते बीकानेर की उस छोटी-सी दुकान की शोहरत आसमान छूने लगी और ग्राहकों की भारी डिमांड को पूरा करने के लिए कारोबार का दायरा बढ़ाना पड़ा।
दादा की शुरू की गई इस शानदार विरासत को असल में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम किया उनके पोते ‘शिव किशन अग्रवाल’ ने, जिन्होंने इस देसी स्वाद को एक कॉर्पोरेट लुक दे दिया। भुजिया की दीवानगी इस कदर बढ़ी कि 1970 में महाराष्ट्र के नागपुर में कंपनी की पहली बड़ी प्रोडक्शन (मैन्युफैक्चरिंग) यूनिट स्थापित की गई।
यह हल्दीराम के एक असंगठित दुकान से ‘प्रोफेशनल ब्रांड’ बनने की दिशा में पहला बड़ा और ऐतिहासिक कदम था। इसके बाद कंपनी ने अपना पोर्टफोलियो बढ़ाया और भुजिया के साथ-साथ कई तरह की नई नमकीन, लाजवाब मिठाइयां और बेवरेजेज (ड्रिंक्स) भी बाजार में उतार दिए। अगर आज के कारोबार की बात करें, तो हल्दीराम के विशाल और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट नागपुर, नई दिल्ली, हुगली (पश्चिम बंगाल), रुद्रपुर (उत्तराखंड) और नोएडा में दिन-रात चल रहे हैं।
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि सिंगापुर, नीदरलैंड, भूटान और यूएई जैसे कई देशों में इसके प्रोडक्ट्स धड़ल्ले से एक्सपोर्ट हो रहे हैं। आज भारत के कुल स्नैक्स मार्केट में 40% से भी ज्यादा की बंपर हिस्सेदारी (Market Share) के साथ हल्दीराम देश का सबसे बड़ा और नंबर-1 ब्रांड बना हुआ है। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस ब्रांड का सबसे छोटा नमकीन पैकेट आज भी गरीब से गरीब इंसान के लिए मात्र 5 रुपये में उपलब्ध है, उस ‘हल्दीराम’ कंपनी की कुल मार्केट वैल्यू आज 85,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा आंकी जाती है।
बीकानेर की गलियों से निकलकर हजारों करोड़ की इस ग्लोबल बादशाहत तक पहुंचने में सबसे अहम भूमिका संस्थापक गंगा बिशन जी के पोते ‘शिव किशन अग्रवाल’ की ही मानी जाती है, जिनके मास्टरमाइंड विजन ने दुनिया को हल्दीराम का दीवाना बना दिया।

