राष्ट्रवाणी: यह लेख सफल भारतीय उद्योगपतियों जैसे धीरूभाई अंबानी, रतन टाटा और गौतम अदाणी की पहली नौकरियों पर प्रकाश डालता है। …और पढ़ें ये हैं सबसे सफल भारतीय अरबपतियों की पहली नौकरी धीरूभाई अंबानी ने यमन में गैस पंप पर काम किया। रतन टाटा ने टाटा स्टील के शॉप फ्लोर से शुरुआत की।
गौतम अदाणी ने मुंबई में हीरे छांटने का काम किया। बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: करोड़ों-अरबों रुपये का कारोबार खड़ा करने वाले दिग्गज उद्योगपतियों की शुरुआत किसी बड़े ऑफिस या ऑलीशान केबिन से नहीं हुई थी। किसी ने विदेश में पेट्रोल पंप पर काम किया, तो किसी ने कारखाने में आम कर्मचारी की तरह अपना करियर शुरू किया।
किसी ने हीरे तराशे, तो किसी ने ऑस्ट्रेलिया में बीयर बनाने वाली इंडस्ट्री में नौकरी की। आज इन नामों को देश के बड़े कारोबारी चेहरों के तौर जाना जाता है, लेकिन उनकी शुरुआती नौकरी की कहानियां संघर्ष, मेहनत और आगे बढ़ने की चाह को दिखाती है। रिलायंस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी से लेकर टाटा समूह के दिग्गज रतन टाटा और अदाणी समूह के गौतम अदाणी तक, इन कारोबारियों की पहली नौकरी और करियर की शुरुआत काफी दिलचस्प रही।
रिलायंस इंडस्ट्रीज की नींव रखने वाले धीरूभाई अंबानी (Dhirubhai Amb) ने यमन के अदन में गैस पंप पर काम किया था। उनकी शुरुआती कमाई करीब 300 रुपये महीने बताई जाती है। इस नौकरी से उन्हें कामकाज और कारोबार को करीब से समझने का मौका मिला।
आगे चलकर उन्होंने अपना व्यापार शुरू किया, जो रिलायंस समूह के रूप में बड़ा बना। रतन टाटा (Ratan tata) ने 1961 में टाटा स्टील के शॉप फ्लोर पर काम करते हुए अपना करियर शुरू किया। यहां उन्हें फैक्ट्री के कामकाज और संचालन को समझने का मौका मिला।
उनकी शुरुआती भूमिका किसी बड़े कारोबारी की तरह सीधे शिर्ष पद पर बैठने की नहीं, बल्कि कंपनी के काम को जमीन पर समझने की थी। अदाणी समूह के संस्थापक गौतम अदाणी (Gautam Ad) 1978 में किशोरावस्था में मुंबई पहुंचे थे। यहां उन्होंने महेंद्र ब्रदर्स के लिए हीरे छांटने का काम किया।
इस अनुभव के बाद उन्होंने हीरों के कारोबार में अपना रास्ता बनाया और आगे चलकर बंदरगाह, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स समेत कई क्षेत्रों में कारोबार खड़ा किया। बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार शॉ (Kiran Mazumdar-Shaw) ने ऑस्ट्रेलिया में ब्रुअरी यानी बियर बनाने वाली उद्योग में ट्रेनी ब्रुअर के तौर पर करियर शुरू किया।
भारत लौटने पर उन्हें ब्रूइंग इंस्ट्री में महिला होने के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बाद में उन्होंने बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अपनी कंपनी बनाई और बायोकॉन को स्थापित पहचान दिलाई। सुधा मूर्ति (sudha murthy) ने टेल्को (अब टाटा मोटर्स) में नौकरी पाने के लिए कंपनी की भर्ती नीति में महिलाओं के साथ भेदभाव का मुद्दा उठाया था।
उन्होंने जेआरडी टाटा को पोस्टकार्ड लिखकर अपनी आपत्ति जताई। इसके बाद उन्हें इंटरव्यू का मौका मिला और वह कंपनी में नियुक्त होने वाली पहली महिला इंजीनियर बनीं। उन्होंने डेवलपमेंट इंजीनियर के रूप में काम शुरू किया।
पेप्सिको की पूर्व सीईओ इंद्रा नूयी (Indra Nooyi) ने अपने करियर की शुरुआत एक ब्रिटिश टेक्सटाइल फर्म में बिजनेस स्ट्रैटेजिस्ट के तौर पर की थी। बाद में उन्होंने भारत में जॉनसन एंड जॉनसन में भी काम किया और फिर अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट जगत में अपनी अलग पहचान बनाई।

