राष्ट्रवाणी: दिवंगत अभिनेता रहे देव आनंद के करियर की कल्ट क्लासिक फिल्म ज्वेल थीफ की रिलीज को जल्द ही 59 साल पूरे होने वाले हैं। देव आनंद की ज्वेल थीफ (फोटो क्रेडिट- आईएमडीबी) आशा बत्रा, मुंबई: छह दशक बाद भी बरकरार है हिंदी फिल्म ज्वेल थीफ का जादू। कैसे निर्देशक विजय आनंद ने हिचकाक शैली के सस्पेंस को भारतीय संगीत, रोमांस और मेलोड्रामा के साथ बेहद खूबसूरती से पिरोया, जिसने इसे एक सदाबहार क्लासिक बना दिया… अक्सर चीजें जैसी दिखती हैं, वैसी होती नहीं हैं।
अभिनेता देव आनंद ने आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में बताया है कि सायरा बानो के साथ फिल्म प्यार मोहब्बत की शूटिंग के दौरान कोपेनहेगन में खरीदी गई एक चेकदार टोपी कैसे सालों बाद ज्वेल थीफ की एक कल्ट पहचान बन गई। नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले बनी और विजय आनंद (गोल्डी) द्वारा निर्देशित यह फिल्म 27 अक्टूबर, 1967 को रिलीज हुई थी।
इस फिल्म में पहचान को धोखे और भ्रम का एक जटिल खेल बना दिया गया था। पैर की छह उंगलियों से लेकर नाइटक्लब के डांस तक, हर दृश्य दर्शकों को भटकाने के लिए रचा गया था। इसके लिए लेखक के. ए. नारायण ने गोल्डी को एक ऐसे आदमी की कहानी सुनाई थी जो वास्तव में था ही नहीं।
ज्वेल थीफ की कहानी के केंद्र में विनय (देव आनंद) है, जो मुंबई के पुलिस कमिश्नर का बेटा और रत्नों का पारखी है। उसे बार-बार अमर नाम का एक कुख्यात चोर समझ लिया जाता है। शालिनी (वैजयंतीमाला) उसे अपना खोया हुआ मंगेतर मानती है, अपराधी उसे अपना साथी समझते हैं और पुलिस को शक है कि विनय बेगुनाह होने का नाटक कर रहा है।
फिल्म का सबसे रोमांचक दृश्य एक जन्मतिथि की पार्टी का है, जहां शालिनी विनय को अमर समझ लेती है, लेकिन उसका भाई अर्जुन (अशोक कुमार) याद दिलाता है कि अमर के दाहिने पैर में छह अंगुलियां थीं। विनय को अपना जूता उतारकर पहचान साबित करनी होती है। एक जूता, एक पैर और इंतजार के कुछ सेकेड सिनेमाई सस्पेंस की बेहतरीन मिसाल बन जाते हैं।
अशोक कुमार को मुख्य खलनायक के रूप में चुनना गोल्डी का सबसे समझदारी भरा फैसला था। दिल की सर्जरी के कारण वह शुरुआत में हिचकिचा रहे थे। उन्होंने दो शर्तों पर काम किया: वह एक्शन सीन नहीं करेंगे और सुबह 11 से शाम 5 बजे तक ही काम करेंगे।
दर्शकों के बीच उनकी छवि एक भले और स्नेही इंसान की थी, जिससे उन पर शक करना नामुमकिन था। जब फिल्म के अंत में मास्टरमाइंड का खुलासा होता है, तो दर्शकों को झटका सिर्फ कहानी से नहीं, बल्कि इस अभिनेता पर अपने अटूट भरोसे से भी लगता है। इस फिल्म के गाने केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कहानी और सस्पेंस को आगे बढ़ाने का जरिया थे।
एस. डी. बर्मन ने खराब स्वास्थ्य के बावजूद इसका संगीत तैयार किया, जिसमें उनके बेटे आर. डी. बर्मन (पंचम) ने मुखड़ों की धुनें बनाईं। पंचम का योगदान इतना बड़ा था कि एलपी रिकार्ड के बैक कवर पर उनकी तस्वीर भी छापी गई थी। होठों पे ऐसी बात गाने में तबला, खोल और बर्मी ड्रम जैसे वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया गया।
डांस डायरेक्टर बी. सोहनलाल की बेहतरीन कोरियोग्राफी और गोल्डी के कैमरावर्क ने इसे अमर बना दिया। सरोज खान, जो उस समय सोहनलाल की असिस्टेंट थीं, ने बताया था कि कैमरे के घूमने के साथ कलाकारों के लिए अपनी जगह बनाए रखना कितना मुश्किल था। वी. रत्रा की सिनेमैटोग्राफी ने इस फिल्म को एक खास विजुअल स्टाइल दिया।
कैमरे को गुप्त रास्तों, घूमती दीवारों और छिपे हुए कमरों से इस तरह गुजारा गया कि पूरी वास्तुकला ही धोखे का हिस्सा बन गई। स्टूडियो के सेटों के अलावा ज्वेल थीफ दर्शकों को सिक्किम के गंगटोक ले गई। उस समय सिक्किम भारत का हिस्सा नहीं बल्कि चोग्याल के अधीन एक संरक्षित राज्य था।
1962 के भारत-चीन युद्ध और नाथुला दर्रे पर तनाव के कारण यह क्षेत्र सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील था। यह फिल्म हमें उस दौर में ले जाती है जब हिंदी सिनेमा सस्पेंस को नचा सकता था, संगीत से कहानी कह सकता था और दर्शकों को चलती-फिरती तस्वीरों के जादू से प्यार करना सिखा सकता था। भले ही हमें इसके गाने याद हों और इसके ट्विस्ट पता हों, मगर लगभग छह दशकों के बाद भी यह फिल्म उतनी ही आकर्षक लगती है।
सस्पेंस सुलझ चुका है, चोर पकड़ा जा चुका है,लेकिन ज्वेल थीफ की यादें आज भी ताजा हैं। दिल पुकारे आ रे आ रे, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी का एक मशहूर युगल गीत है। इस गाने के पीछे एक ऐतिहासिक किस्सा है- एस. डी. बर्मन ने ही दोनों गायकों के बीच के पुराने मनमुटाव को दूर कराया था, जिसके बाद उन्होंने सालों बाद एक साथ काम किया।
वहीं दूसरी ओर, रुला के गया सपना मेरा, गाने में एक अलग ही दर्द है। फिल्म तीसरी कसम, की असफलता से निराश गीतकार शैलेंद्र गाना नहीं लिखना चाहते थे, लेकिन विजय आनंद के मनाने पर उन्होंने यह दर्दभरा गीत लिखा। बाद में शैलेंद्र की सिफारिश पर मजरूह सुल्तानपुरी ने फिल्म के बाकी गीत लिखे।

