राष्ट्रवाणी: गुलशन देवैया बॉक्स ऑफिस की दौड़ से दूर अपनी शर्तों पर काम करना पसंद करते हैं, अच्छी कहानी और निर्देशक को प्राथमिकता देते हैं। अच्छी कहानी और निर्देशक को देते हैं प्राथमिकता अभिनेता विज्ञापनों और इवेंट्स से दूर रहते हैं प्रियंका सिंह, मुंबई। अक्सर ऐसा होता है कि बड़ी कमर्शियल हिट फिल्म देने के बाद कलाकार ऐसी फिल्में ही करना चाहते हैं, जो बड़ी कमाई करे।
हालांकि अभिनेता गुलशन देवैया की सोच इससे अलग है। कांतारा : चैप्टर 1 फिल्म के बाद गुलशन देवैया छोटे बजट की और इंडिपेंडेंट फिल्में कर रहे हैं। हालिया रिलीज फिल्म लिटिल थॉमस के बाद उनकी कन्नड़ फिल्म रिलीज की कतार में है।
गुलशन कहते हैं कि लिटिल थामस मैंने यूं तो कांतारा : चैप्टर 1 से पहले शूट कर ली थी, लेकिन अगर यह फिल्म आज भी मेरे पास आती, तो कर लेता। मुझे ऐसा करियर पसंद है, जिसमें अलग-अलग फिल्में हों। एक जैसी फिल्में करके मैं बोर हो जाता हूं।
इसके बाद भी मैं अलग जोन वाली फिल्में कर रहा हूं, एक इंडिपेंडेंट कन्नड़ फिल्म है। स्टूडियो वाली फिल्में नहीं हैं। बॉक्स आफिस पर सफलता के मायने को लेकर गुलशन कहते हैं कि मैंने इसके बारे में सोचा नहीं है, न ही मुझे यह बातें सूझती हैं।
मैं परिणाम केंद्रित नहीं होना चाहता हूं। कुछ हद तक सोचा-समझा भी है, क्योंकि परिणाम के बारे में सोचकर दिमाग बहुत खराब होता है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो आपको आकर बताते हैं कि ये देखो आपकी फिल्म ने इतना कमाया है।
अब देखना आपकी निकल पड़ेगी। मैं ऐसा नहीं सोचना चाहता हूं, बाकी जिसे सोचना है वो सोचे। मुझे जिसमें रूचि है, उसे अच्छे से करना चाहता हूं।
अच्छी कहानी, कलाकार, निर्देशक मिल जाए, इतना मेरे लिए काफी है। इसके बाद फिल्म कितना कमाएगी? कौन देखेगा?
पसंद करेगा या नहीं करेगा? इन प्रश्नों के उत्तर मुझे नहीं चाहिए। इन्हीं उसूलों पर काम करते-करते मैं अपने करियर में ठीक-ठाक जगह पर आ गया हूं।
कई कलाकार अपनी प्रसिद्धि से और पैसे भी कमाते हैं, हालांकि गुलशन यह भी नहीं करना चाहते हैं। वह कहते हैं कि लोग ऐसा करते होंगे, मैं नहीं करता हूं। मैंने अपने करियर में चार विज्ञापन किए हैं।
साल 2017 के बाद कोई विज्ञापन नहीं किया है, न ही इंस्टाग्राम पर कुछ बेचता हूं, न इवेंट्स करता हूं। मैं सिर्फ लान्ग और शॉर्ट फार्मेट में काम करना चाहता हूं। मैं अपनी फिल्मों और वेब सीरीज से पैसे कमाऊंगा, जो अच्छा चल रहा है।
ऐसा नहीं है कि मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैं कई बार सोचता हूं कि जब कोरोना काल में जब लाकडाउन लगा था, तो मैं किसी कर्ज में नहीं था। कई लोगों पर काफी कर्ज था।
मैं सोच रहा था कि कमाल है, मैं अपने उसूलों के साथ काम कर रहा हूं, लेकिन एक रुपये का कर्ज नहीं था। मैं लोगों की मदद कर रहा था। मेरे स्टाफ को मैंने कहा था कि जब तक ये कोविड चल रहा है, आप चिंता मत करिए आपकी सैलरी आपके अकाउंट में पहुंच जाएगी।
लोगों को अब समझ आए या ना आए, लेकिन मेरी यह रणनीति मेरे लिए काम कर रही है। परिणाम भी अच्छे होते हैं, लेकिन आप पर है आप उससे कितने प्रभावित होते हैं। अब कांतारा : चैप्टर 1 ने साढ़े आठ सौ करोड़ रुपये कमाएं, किसी ने पूछा कैसा लग रहा है, मैंने कहा अच्छा लग रहा है।
मा इंटी बंगारम ने सौ करोड़ का आंकड़ा पार किया, 25-30 करोड़ में फिल् बनी थी। मैं खुश था, क्योंकि इसके कारण मैं थोड़े और पैसे यानी फीस बढ़ा पाऊंगा। नए दरवाजे खुलेंगे, लेकिन केवल इसी पर फोकस नहीं है।
इस पर वह हंसते हुए कहते हैं कि मैंने अपने माता-पिता से सवाल कम ही किए हैं। अपने ख्यालों में रहता था। पापा से तो 15-16 साल की उम्र तक डरता था।
फिर थोड़ा और बड़ा हुआ, तो लगा पापा ही तो हैं। इस पर वह कहते हैं कि जब कोविड के दौरान स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर कंटेंट आया था, तो सबने इस पर रिलीज हुई हर चीज देखी। हर कंटेंट को इसका फायदा मिल रहा था।
ऐसा ही होता है, जब कोई चीज नई आती है, तो तेजी से ऊपर जाती है, फिर हर चीज संभलती है। पहले फिल्मों और वेब सीरीज के बजट ज्यादा होते थे। फिर मार्केट को देखकर लगा कि इतना पैसे कैसे खर्च करेंगे।
सिनेमा और स्ट्रीमिंग के बजट का अलग है, लेकिन फिर भी दोनों जगहों पर एक बहुत गंभीर प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। सब संतुलित और स्थिर हो रहा है। एक समय पर सबने मान लिया था कि सिनमा तो खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
फिर सुनने में आया कि दक्षिण भारतीय सिनेमा ने यहां आकर सबका सफाया कर दिया है, वो भी नहीं हुआ है। लोग ट्रेंड चला देते हैं, लेकिन उससे कुछ नहीं होता है।

