राष्ट्रवाणी: इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब किसी बड़ी खोज को शुरुआत में कोई तवज्जो नहीं मिली। ऐसी ही …और पढ़ें मटर के पौधों पर हुई वो पुरानी रिसर्च, जिसने 160 साल बाद नीलामी में कमाए 6.10 करोड़ रुपये (Image Source: एआई-Generated) जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली।
क्या आपको पता है कि 1866 में एक पादरी ने मटर के पौधों पर एक ऐसी रिसर्च की थी, जिसे उस समय किसी ने घास भी नहीं डाली, मगर आज वही रिसर्च विज्ञान के इतिहास का एक बेहद कीमती हिस्सा बन चुकी है। जी हां, ग्रेगर मेंडल नाम के इस पादरी का वह पुराना रिसर्च पेपर हाल ही में अक्टूबर 2026 में क्रिस्टीज की एक नीलामी में करीब 6.10 करोड़ रुपये में बिका है।
आइए जानते हैं क्या खास था इस रिसर्च में। ग्रेगर मेंडल का जन्म 1822 में मोराविया (आज का चेक रिपब्लिक) के एक आम किसान परिवार में हुआ था। घरवाले चाहते थे कि वो भी खेती करें, पर मेंडल को तो पढ़ाई का शौक था।
इसलिए वो 1843 में ब्रनो शहर के एक मठ में पादरी बन गए। बाद में उन्होंने वियना यूनिवर्सिटी से पढ़ाई भी की। मठ वापस आकर उनके दिमाग में एक सवाल घूमा कि आखिर पौधों में एक पीढ़ी के गुण दूसरी पीढ़ी में कैसे जाते हैं?
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए मेंडल ने अपने मठ के बगीचे में ही काम शुरू कर दिया। उन्होंने करीब 10 सालों तक 30,000 से ज्यादा मटर के पौधों को आपस में क्रॉस-ब्रीड किया। मेंडल ने पौधों के 7 अलग-अलग लक्षणों पर नजर रखी, जैसे बीज का आकार, रंग आदि।
खास बात ये थी कि उन्होंने सिर्फ अंदाजा नहीं लगाया, बल्कि गणित का इस्तेमाल करके एक पूरा पैटर्न तैयार किया कि कैसे एक पौधे के गुण दूसरे में जाते हैं। इसी से आधुनिक जेनेटिक्स की नींव पड़ी। 1865 में मेंडल ने अपनी ये गजब की रिसर्च एक स्थानीय वैज्ञानिक संस्था के सामने रखी।
अगले साल 1866 में, इसे “Experiments on Plant Hybrids” नाम से छापा भी गया। मेंडल ने खुद इसकी 40 स्पेशल कॉपियां अपने दोस्तों और साथी वैज्ञानिकों को बांटी। इसके अलावा, ये जर्नल दुनिया भर के 134 संस्थानों तक भी पहुंचा।
मगर हैरानी की बात है कि उस वक्त किसी ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया। करीब 34 साल बाद, 1900 में तीन अलग-अलग वैज्ञानिक (ह्यूगो डी व्रीज, कार्ल कोरेंस और एरिच वॉन त्शेरमैक) जब खुद इसी तरह की रिसर्च कर रहे थे, तब वे भी उसी नतीजे पर पहुंचे जो मेंडल सालों पहले बता चुके थे। तब जाकर दुनिया को समझ आया कि मेंडल ने कितनी बड़ी खोज की थी।
नीलामी में बिकी ये कॉपी उन्हीं 40 ओरिजिनल कॉपियों में से एक है जो मेंडल ने खुद बंटवाई थीं। क्रिस्टीज के मुताबिक, आज दुनिया में इसकी सिर्फ 16 या 17 कॉपियां ही बची हैं। 47 पन्नों की ये रिसर्च बहुत ही अच्छी हालत में है।
इसका पुराना पीला कवर और ग्रे रंग की बाइंडिंग आज भी वैसी ही है। इसे एक हरे रंग के खास बॉक्स में सुरक्षित रखा गया है। मजे की बात ये है कि यही कॉपी जुलाई 2016 में भी नीलाम हुई थी और 10 साल बाद इसके मालिक ने इसे दोबारा नीलाम किया।
मेंडल को अपने जीते जी वो सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। हालांकि, उनके बताए हुए सिद्धांत आज भी बायोलॉजी, खेती, मेडिकल साइंस और इंसान के विकास को समझने में सबसे ज्यादा काम आते हैं। यह रिसर्च हमें सिखाती है कि कभी-कभी किसी क्रांतिकारी विचार को दुनिया तक पहुंचने और समझे जाने में दशकों लग सकते हैं।

