राष्ट्रवाणी (रायपुर ब्यूरो): प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के घरौंदा केंद्रों में रह रहे मानसिक दिव्यांग और जरूरतमंद लोगों की देखभाल में गंभीर लापरवाही के आरोपों पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। रायपुर और बिलासपुर के पुरुष एवं महिला घरौंदा केंद्रों की जांच करने वाले कोर्ट कमिश्नरों की रिपोर्ट में चिकित्सा सुविधाओं की कमी, अपर्याप्त भोजन, खराब स्वच्छता और एक निवासी को चारपाई से बांधकर रखने जैसी गंभीर स्थिति सामने आई है।
रिपोर्ट में रायपुर के महिला केंद्र से जुड़े पांच लोगों की मौत का भी उल्लेख है। इन तथ्यों पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि केंद्रों की स्थिति चिंताजनक है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति कृष्ण राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की पीठ ने तीन नवंबर को कोपल वाणी चाइल्ड वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन की जनहित याचिका सहित संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई की।
कोर्ट कमिश्नरों ने रायपुर और बिलासपुर के केंद्रों का निरीक्षण कर रिपोर्ट पेश की, जिसे रिकार्ड पर लिया गया। रायपुर के महिला और पुरुष केंद्रों की जांच में सामने आया कि डॉक्टरों को सप्ताह में दो बार केंद्रों का दौरा करना था, लेकिन पिछले तीन महीने के रजिस्टर में महीने में केवल एक-दो बार आने का रिकॉर्ड मिला।
24 घंटे नर्स या पैरामेडिकल कर्मचारी की उपलब्धता और नियमित मनोचिकित्सकीय जांच का भी रिकॉर्ड नहीं मिला। कमिश्नर ने यह भी बताया कि किसी निवासी के आक्रामक होने पर कर्मचारियों ने उसे पसंद का खाना देकर शांत करने की बात कही, लेकिन आपात स्थिति में पेशेवर चिकित्सा सहायता की व्यवस्था स्पष्ट नहीं कर सके।
महिला केंद्र से जुड़े वर्ष 2026 के पांच मृत्यु मामलों में चार वयस्क महिलाओं और एक बच्चे कबीर की मौत दर्ज है। रिपोर्ट के अनुसार, मौतों की सूचना पुलिस, जिला स्तरीय समिति और वरिष्ठ विभागीय अधिकारियों को दिए जाने के दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। बच्चे की मौत के मामले में अस्पताल के रिकॉर्ड में सेप्सिस और गंभीर शॉक का उल्लेख है।
कर्मचारियों ने कमिश्नर को बताया कि बच्चा बिस्तर से गिरा था और उसे दौरे पड़े थे, लेकिन अस्पताल के रिकॉर्ड में कई गंभीर बीमारियों का उल्लेख है। कमिश्नर ने इस मामले की स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञों से जांच कराने की जरूरत बताई है। रिपोर्ट में किसी की लापरवाही को अभी सिद्ध नहीं माना गया है।
बिलासपुर के पुरुष केंद्र के निरीक्षण में एक निवासी को चारपाई के चारों कोनों से कपड़े से बांधकर रखा गया था। कर्मचारियों ने उसे आक्रामक बताया। कमिश्नर के हस्तक्षेप पर उसे खोला गया तो वह सामान्य रूप से शौचालय गया और अन्य निवासियों के साथ बैठ गया।
उसे बांधने के लिए कोई चिकित्सकीय सलाह या लिखित अनुमति भी प्रस्तुत नहीं की गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि निवासियों के अलग-अलग स्वास्थ्य रिकॉर्ड नहीं रखे जा रहे थे। डॉक्टर के दौरे के रजिस्टर में महीने में एक सामूहिक जांच का ही उल्लेख था, जबकि योजना के अनुसार सप्ताह में दो बार डॉक्टर का दौरा होना चाहिए।
भोजन की गुणवत्ता खराब और मात्रा अपर्याप्त पाई गई। शौचालयों की स्वच्छता भी संतोषजनक नहीं थी। राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता ने रिपोर्ट हाल में मिलने का हवाला देते हुए जवाब प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा।
कोर्ट ने दो सप्ताह में दोनों रिपोर्टों पर विस्तृत जवाब दाखिल करने और उसकी प्रति कोर्ट कमिश्नरों को देने का निर्देश दिया। साथ ही सरकार से यह जानकारी मांगी है कि क्या कमिश्नरों को राज्य के घरौंदा केंद्रों में लगे सीसीटीवी कैमरों तक पहुंच दी जा सकती है। कोर्ट ने जिला नोडल अधिकारियों और केंद्र प्रभारियों को निर्देश दिया कि वे दिशा-निर्देशों के प्रावधानों के तहत अपनी मासिक रिपोर्ट संबंधित कोर्ट कमिश्नरों को उपलब्ध कराएं।
मामले की अगली सुनवाई तीन दिसंबर 2026 को होगी।

