भारत ने अपनी कच्चे तेल आयात रणनीति में बदलाव किया है, जिसमें रूस से तेल का आयात घट रहा है और सऊदी अरब से आपूर्ति बढ़ रही है। जनवरी और फरवरी में भारत का कुल तेल आयात कम हुआ है, और रूस से आयात में गिरावट देखी गई है, जो प्रतिबंधों और शिपिंग की दिक्कतों के कारण है। इसके बजाय, सऊदी अरब अब सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन रहा है, जो फरवरी में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस का तेल कम होने से लागत में थोड़ी बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए यह रणनीति अपना रहा है। यह कदम भारत की ऊर्जा योजना का एक संतुलित और रणनीतिक हिस्सा है, जिसमें वह कीमत और राजनीति दोनों का ध्यान रख रहा है।

भारत की नई तेल योजना का मकसद
बदलते वैश्विक हालात में भारत ने अपनी कच्चे तेल की खरीदारी का तरीका बदल दिया है। रूस से तेल की आपूर्ति में कमी आई है, जबकि सऊदी अरब से आपूर्ति बढ़ रही है। यह कदम ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए उठाया गया है। भारत धीरे-धीरे अपने स्रोतों को संतुलित कर रहा है ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम हो सके।

रूस से तेल की आपूर्ति घट रही है
यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस से तेल खरीदने का रुख बढ़ा था। जनवरी में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था। लेकिन अब अमेरिका और यूरोपीय संघ के नए प्रतिबंधों के कारण, भुगतान, शिपिंग और बीमा में परेशानियों के चलते रूस से तेल का प्रवाह कम हो रहा है। फरवरी में रूस से तेल की मात्रा घटकर करीब 10.9 लाख बैरल प्रति दिन रह गई है।

सऊदी अरब की भूमिका मजबूत हुई
रूस से तेल की आपूर्ति कम होने के बावजूद, सऊदी अरब भारत का प्रमुख तेल स्रोत बन रहा है। फरवरी में सऊदी अरब से तेल की आपूर्ति 10 से 11 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकती है, जो 2019 के बाद का उच्चतम स्तर है। इससे फरवरी में सऊदी भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन सकता है।

लागत में बढ़ोतरी और चुनौतियां
विशेषज्ञों का कहना है कि रूस से तेल कम होने से भारत की औसत लागत में 2-3 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी हो सकती है। वेनेजुएला से सस्ता तेल खरीदने की कोशिश की जा रही है, लेकिन उसकी सीमित आपूर्ति और लॉजिस्टिक चुनौतियों के कारण यह विकल्प पूरी तरह कारगर नहीं है।

भारत का संतुलित रुख
भारत पूरी तरह रूस से दूरी नहीं बना रहा है। घरेलू जरूरतों और रिफाइनरी संचालन को देखते हुए, रूस से न्यूनतम आवश्यक मात्रा में तेल अभी भी खरीदा जा रहा है। जब तक अमेरिका-भारत व्यापार समझौता पूरा नहीं हो जाता, तब तक भारत अपने स्रोतों में संतुलन बनाए रखेगा। भू-राजनीतिक और कीमत दोनों ही कारक अब महत्वपूर्ण हो गए हैं।

भारत ने अपनी कच्चे तेल की रणनीति में बदलाव कर दुनिया के प्रतिबंधों और राजनीतिक हालात का ध्यान रखा है। सऊदी अरब की भूमिका मजबूत होने से तेल की सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है, जबकि रूस से आपूर्ति कम होने से लागत थोड़ी बढ़ सकती है। यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संतुलन के लिए एक जरूरी रणनीति है।



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