राष्ट्रवाणी: Bond Yields US 10 Year: अमेरिकी 10-साल की बॉन्ड यील्ड 2007 के बाद उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है, जिससे …और पढ़ें क्या होता है बॉन्ड यील्ड और इसकी चर्चा क्यों। जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| बॉन्ड यील्ड चर्चा में है। वजह- अमेरिका में 10-साल की बॉन्ड यील्ड 2007 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर (bond yields us 10 year) पहुंच गई है।
जिसका सीधा असर गोल्ड-सिल्वर की कीमतों पड़ता हुआ नजर आ रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों को बिना जोखिम के फिक्स रिटर्न मिलने लगता है। ऐसे में वे सोने-चांदी से पैसा निकालकर बॉन्ड में लगाते हैं, क्योंकि सोने पर कोई ब्याज नहीं मिलता।
मजबूत होता डॉलर भी इन पर दबाव डाल रहा है। हालांकि, भारतीय निवेशकों के लिए तस्वीर थोड़ी अलग है, क्योंकि यहां रुपए की चाल और इंपोर्ट ड्यूटी भी मायने रखती है। सवाल है कि आखिर बॉन्ड यील्ड होती क्या है?
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से सोने-चांदी पर क्या असर पड़ता है? एक आम निवेशक बॉन्ड यील्ड, सोने और चांदी के कनेक्शन (bond yield vs gold silver) को कैसे ट्रैक कर सकता है और कौन-से इंडिकेटर्स सबसे अहम हैं? ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब दिए कोटक सिक्योरिटीज के कमोडिटी एंड करेंसी रिसर्च हेड अनिंद्य बनर्जी ने।
चलिए आसान भाषा में सिर्फ 4 पॉइंट्स में समझते हैं वो सबकुछ, जो गोल्ड-सिल्वर की खरीदारी से पहले आपके लिए जानना जरूरी है। जवाबः बॉन्ड एक तरह का लोन है, जो निवेशक सरकार या कंपनियों को देते हैं। फिक्स्ड-रेट बॉन्ड में ब्याज तय होता है, लेकिन बाजार में इसकी कीमत बदलती रहती है।
यील्ड हमें यह बताती है कि निवेशक ने जिस कीमत पर बॉन्ड खरीदा है, उस पर उसे असल में कितना रिटर्न मिल रहा है। उदाहरण के लिए, अगर 1,000 रुपए का बॉन्ड सालाना 70 रुपए ब्याज देता है, तो उसकी करंट यील्ड 7% है। अगर बॉन्ड की कीमत गिरकर 900 रुपए हो जाए, तो उसी 70 रुपए के ब्याज पर यील्ड 7.78% हो जाएगी।
यानी ब्याज नहीं बढ़ा, बल्कि खरीदने की कीमत कम हो गई है। यील्ड टू मैच्योरिटी (YTM) में खरीदने की कीमत और मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम के अंतर को भी जोड़ा जाता है।” इसी वजह से इनमें उल्टा संबंध होता है। जब बाजार में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो कम ब्याज देने वाले पुराने बॉन्ड कम आकर्षक हो जाते हैं और उनकी कीमतें गिर जाती हैं।
जब दरें गिरती हैं, तो पुराने फिक्स ब्याज वाले बॉन्ड कीमती हो जाते हैं और उनके दाम बढ़ जाते हैं। सीधी सी बात यह है कि फिक्स ब्याज का मतलब फिक्स कीमत नहीं है। अगर निवेशक मैच्योरिटी से पहले बॉन्ड बेचता है, तो उसे मुनाफा या नुकसान हो सकता है।
जवाबः अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड दुनिया भर में पैसे की लागत (cost of money) तय करती है। कंपनियों के लिए कर्ज लेना, शेयर बाजार का वैल्यूएशन, और करेंसी या कीमती धातुओं का आकर्षण, सब इसी से तय होता है। डॉलर की ताकत और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड मार्केट के बड़े आकार के कारण यह इतना अहम है।
30 सितंबर को यूरोपियन ट्रेडिंग में अमेरिका की 10-साल की यील्ड लगभग 5.24% थी, जो 2007 के बाद सबसे ज्यादा है। ब्रेंट क्रूड 103 डॉलर प्रति बैरल के पार था। फेडरल रिजर्व ने 16 सितंबर को ब्याज दरें 0.25% बढ़ाकर 3.75-4.00% कर दी थीं।
इसलिए तेल और फेड (Fed) इस पूरी कहानी के केंद्र में हैं। महंगा तेल महंगाई को लंबा खींच सकता है, जिससे सेंट्रल बैंक दरें घटाने में संकोच करेंगे। लेकिन लंबी अवधि की यील्ड यह भी दिखाती है कि सरकार को कितना कर्ज चाहिए और अनिश्चित माहौल में निवेशक जोखिम उठाने के लिए कितना ज्यादा रिटर्न मांग रहे हैं।
जवाबः यील्ड बढ़ने पर सोना रखना घाटे का सौदा लगने लगता है, क्योंकि सोने पर कोई ब्याज नहीं मिलता। अगर निवेशकों को हाई-क्वालिटी बॉन्ड से बढ़िया रिटर्न मिलने लगे, तो सोने को कड़ी टक्कर मिलती है। मजबूत डॉलर इस दबाव को और बढ़ा देता है।
यहां रियल यील्ड यानी महंगाई दर घटाने के बाद का रिटर्न देखना ज्यादा सही पैमाना है। बाजार को समझने के लिए इन्फ्लेशन-प्रोटेक्टेड ट्रेजरी यील्ड एक अच्छा बेंचमार्क है। सिर्फ 10-साल की यील्ड में से आज की महंगाई दर घटा देना सही तुलना नहीं है।” हालांकि, यह नियम हमेशा काम नहीं करता।
अगर निवेशकों को आर्थिक अस्थिरता, युद्ध के खतरे या करेंसी के कमजोर होने का डर हो, तो यील्ड के साथ-साथ सोने के दाम भी बढ़ सकते हैं। केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और इन्वेस्टमेंट फ्लो भी ब्याज दरों के दबाव को बेअसर कर सकते हैं। 2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों की कुल सोने की खरीद 289 टन तक पहुंच गई।
इससे डायवर्सिफिकेशन वाली बात सही साबित होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कीमतें गिर नहीं सकतीं। चांदी का मामला थोड़ा अलग है, क्योंकि इसमें इंडस्ट्रियल डिमांड (जैसे सोलर और इलेक्ट्रॉनिक्स) भी शामिल है। इसलिए, ब्याज दरें बढ़ने और आर्थिक ग्रोथ धीमी पड़ने से चांदी पर सोने से भी ज्यादा दबाव पड़ता है।
सोनाना मुख्य रूप से एक फाइनेंशियल एसेट है। चांदी में ये खूबियां तो हैं ही, लेकिन इंडस्ट्री से जुड़े होने के कारण इसकी कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव (volatility) होता है।” जवाबः बाजार की हर छोटी-बड़ी खबर के पीछे भागने से बेहतर है कि कुछ गिने-चुने आंकड़ों पर नजर रखी जाए। प्रैक्टिकली नियम सीधा है।
बढ़ती रियल यील्ड और मजबूत डॉलर आमतौर पर सोने-चांदी के लिए माहौल मुश्किल बनाते हैं। अगर इन दोनों के बावजूद सोना मजबूती से टिका है, तो समझें कि कोई एक्स्ट्रा डिमांड उसे सहारा दे रही है। यह मजबूती अहम है, लेकिन सिर्फ इसी के आधार पर पूरी स्थिति का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

