राष्ट्रवाणी: समुद्र मंथन की कहानी
- श्रीमद्भागवत महापुराण के 8वें स्कंध के 8वें अध्याय में समुद्र मंथन के प्रसंग में भगवान धन्वंतरि जिक्र है।
- भारतीय संस्कृति में सोना और चांदी को समृद्धि का प्रतीक माना गया है।
- कई विद्वान और परंपरा-विशेषज्ञ मानते हैं कि धनतेरस पर असल में नए बर्तन जैसे कलश, घड़ा और पूजा से जुड़े बर्तन खरीदने की प्रथा थी।
श्रीमद्भागवत महापुराण के 8वें स्कंध के 8वें अध्याय में समुद्र मंथन के प्रसंग में भगवान धन्वंतरि जिक्र है. वह इस मंथन के तेरहवे दिन अमृत कलश लेकर प्रकट हुए. इसलिए इस त्योहार को धन्वंतरि त्रयोदशी भी कहा जाता है. वे आयुर्वेद और आरोग्य के देवता माने जाते हैं. धन्वंतरि के हाथ में स्वर्ण कलश होने की मान्यता ने इस दिन धातु और मूल्यवान वस्तुओं की खरीद को शुभ बना दिया. समय के साथ यही विश्वास सोने-चाँदी की खरीदारी से जुड़ गया. हालांकि इस दिन सोना-चांदी ही खरीदना चाहिए, इस बात का जिक्र किसी धर्म ग्रंथ में नहीं है. लेकिन वैभव की कामना के साथ कुछ लोगों ने इस कलश के रूप में बर्तन खरीदने शुरू कर दिए, तो धीरे-धीरे बाजार ने ‘स्वर्ण-कलश’ के स्वर्ण यानी सोने को वैभव और सेहत से जोड़ दिया. विष्णु पुराण के प्रथम अंश के अध्याय 9 में समुद्र मंथन का वर्णन है. समुद्र मंथन में कई अनमोल चीजें निकली थीं. इसी कथा में देवी लक्ष्मी के प्रकट होने का वर्णन मिलता है. देवी लक्ष्मी को ऐश्वर्य, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री माना गया है. सोने की खरीद माता लक्ष्मी से भी जोड़ दी गई. धातु को धन का प्रतीक मानना
भारतीय संस्कृति में सोना और चांदी को समृद्धि का प्रतीक माना गया है. सोना दुर्लभ, टिकाऊ और समय के साथ मूल्य बनाए रखने वाली धातु रही है. इसलिए उसे केवल आभूषण नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक पहुंचने वाली परिवारिक संपत्ति भी माना गया. इसके पीछे आर्थिक सोच भी अहम है. पुराने समय में बैंकिंग, बीमा या इनवेस्टमेंट के औपचारिक विकल्प उतने नहीं थे. ऐसे में सोने के गहने या सिक्के जरूरत पड़ने पर बेचे या गिरवी रखे जा सकते थे. यही व्यावहारिक उपयोगिता सोने को ‘सुरक्षित धन’ का दर्जा देती है. यही वजह है कि भारतीय परंपरा में सोने के आभूषण रखना हमेशा समझदारी का प्रतीक समझा जाता है. बाजार ने बर्तन से ज्यादा बनाया सोने को जरूरी
कई विद्वान और परंपरा-विशेषज्ञ मानते हैं कि धनतेरस पर असल में नए बर्तन जैसे कलश, घड़ा और पूजा से जुड़े बर्तन खरीदने की प्रथा थी. धन्वंतरि के अमृत-कलश से इसका संबंध जोड़ा गया. लेकिन बाद में जब सोना-चांदी और धातु को समृद्धि का प्रतीक माना गया, तो बर्तन की जगह सोने के गहने और चांदी की चीजें खरीदने की बात होने लगी. अब दुकानों की जगह डिजिटल गोल्ड का क्रेज
पहले धनतेरस का मतलब लगभग हमेशा जौहरी की दुकान जाना होता था. अब उपभोक्ता के पास भौतिक सोने के अलावा कई डिजिटल विकल्प हैं. सोने की कीमतों के चलते एक बार में कोई गहना खरीदना आसान नहीं है. लोग ईएमआई या गोल्ड स्कीम्स चुनते हैं. ऐसे में अब ट्रेडिशनल खरीददारी की जगह डिजिटल गोल्ड ने ले ली है. डिजिटल गोल्ड में निवेशक छोटी रकम से भी सोना खरीद सकता है. इसकी सुविधा यह है कि भौतिक भंडारण, चोरी या शुद्धता की चिंता कम होती है. लेकिन इसे खरीदने से पहले जिस प्लेटफॉर्म से आप खरीद रहे हैं उसकी विश्वसनीयता, स्टोरेज फी, फिजिकल डिलीवरी की शर्तें और विड्रॉअल का प्रोसेस जैसी चीजें जरूर समझ लेनी चाहिए. धनतेरस पर सोना खरीदते समय क्या ध्यान रखें?
धनतेरस पर सोना खरीदना शुभ माना जाता है, पर सिर्फ ट्रेंड या ‘प्रथा’ के चक्कर में खरीदारी न करें. बल्कि इसके पीछे के मोटिव को समझें. जैसे अपना बजट तय करें न कि फेस्टिवल के नाम पर खरीददारी करें. हॉलमार्क, वजन, कीमत, जीएसटी और रिटर्न पॉलिसी लिखित रूप में समझें. यानी परंपरा को बनाए रखें पर प्रैक्टिकल होना न भूलें. QR स्कैन करें, डाउनलोड करें News18 ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें
