नयी दिल्ली/कटक. स्टैनफोर्ड यूनिर्विसटी के ‘ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी टूल’ की हालिया रिपोर्ट में भारत ने कृत्रिम मेधा (एआई) में विश्व की प्रतिस्पर्धी क्षमताओं के मामले में तीसरा स्थान हासिल किया है. ‘ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी टूल’ शोध एवं विकास, प्रतिभा, अवसंरचना सहित सात प्रमुख क्षेत्रों में हुई प्रगति का आकलन करता है.
नवंबर में जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने चार स्थान की छलांग लगाई है और कृत्रिम मेधा में प्रतिस्पर्धी क्षमता के मामले में ब्रिटेन के साथ-साथ एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और जापान को पीछे छोड़ दिया है. वर्ष 2024 के ‘ग्लोबल वाइब्रेंसी’ सूचकांक में भारत 21.59 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा. इसके बाद दक्षिण कोरिया (17.24 अंक) और ब्रिटेन (16.64 अंक) का स्थान है.
भारत 2023 में सातवें स्थान पर था जबकि ब्रिटेन छठे से पांचवें स्थान पर पहुंच गया है. रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों ने वैश्विक कृत्रिम मेधा व्यवस्था में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए हाल के वर्षों में कई प्रमुख योजनाओं को दोबारा सक्रिय किया है. स्टैनफोर्ड यूनिर्विसटी की एआई इंडेक्स रिपोर्ट 2025 में देशों की रैंकिंग वर्ष 2024 की ‘ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी रैंकिंग’ के आधार पर प्रस्तुत की गई है.
प्रौद्योगिकी मनुष्यों की निर्णय क्षमता को बढ़ाये, न कि उनकी जगह ले: प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने रविवार को कहा कि प्रौद्योगिकी को मानवीय निर्णय क्षमता को बढ़ाना चाहिए, न कि उसका स्थान लेना चाहिए. प्रधान न्यायाधीश यहां ‘आम आदमी के लिए न्याय सुनिश्चित करना: मुकदमेबाजी की लागत और देरी को कम करने की रणनीतियां’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे.
उन्होंने कहा, “अदालतों में लंबित मामलों से न्यायिक संरचना के हर स्तर पर, अधीनस्थ न्यायालय से लेकर संवैधानिक अदालत तक, बाधा उत्पन्न होती है. और जब शीर्ष स्तर पर बाधा उत्पन्न होती है, तो नीचे दबाव और भी बढ़ जाता है.” प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने लंबित मामलों को कम करने के लिए न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.
उन्होंने कहा, “ऐसा इसलिए है क्योंकि पर्याप्त अदालतों के बिना ईमानदार न्यायिक प्रणाली भी अवसंरचना संबंधी दबाव के कारण ध्वस्त हो जाएगी.” न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान प्रौद्योगिकी बहुत उपयोगी साबित हुई.
उन्होंने हालांकि कहा, “हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रौद्योगिकी के अपने नकारात्मक पहलू भी हैं.”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ” ‘डीप फेक’ और ‘डिजिटल अरेस्ट’ के इस युग में अदालतें आशावादिता का सहारा नहीं ले सकतीं. यह सुधार गरीबों, बुजुर्गों या डिजिटल रूप से अपरिचित लोगों को बाहर रखता है, यह सुधार नहीं बल्कि प्रतिगमन है. इसलिए मैंने हमेशा यह माना है कि प्रौद्योगिकी को न्याय का सेवक बने रहना चाहिए, न कि उसका विकल्प. इसे मानवीय निर्णय क्षमता को बढ़ाना चाहिए, न कि उसका स्थान लेना चाहिए.” उन्होंने कहा कि एक ऐसी व्यवस्था जहां कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सामंजस्य से काम नहीं कर सकती तब तक कानून का शासन संतुलन नहीं बना सकता, आगे बढ़ना तो दूर की बात है.
