राष्ट्रवाणी: रायपुर। आज 29 जुलाई को भारतीय संस्कृति में श्रद्धा और आस्था का एक उज्ज्वल पर्व है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा जिसे गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। भारत में गुरु पूर्णिमा ज्ञान, अनुशासन और जीवन-दर्शन की आधारशिला है। गुरु पूर्णिमा मात्र पंचांग में मुद्रित एक पूर्णिमा नहीं बल्कि गुरु-शिष्य की अमर परंपरा का उत्सव है। गुरुओं ने भारतीय सभ्यता को हजारों वर्षों तक मार्गदर्शन दिया है। श्रीसंत तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध गुरु वंदना बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रवि कर निकर॥ इसमें गुरु के चरण कमलों को कृपा का समुद्र, मनुष्य रूप में साक्षात भगवान और उनके वचनों को अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाने वाली सूर्य की किरणें बताया गया है। भारतीय दर्शन में गुरु को परमब्रह्म के तुल्य माना गया है। “गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु…” का मंत्र बताता है कि गुरु सृष्टि के निर्माण, पालन और मार्गदर्शन की तरह ही शिष्यों के जीवन को रूपांतरित करने की क्षमता भी रखते हैं। गुरु पूर्णिमा का दिन एक असीम आध्यात्मिक ऊर्जा को अनुभव करने और आत्मिक उन्नति की दिशा में बढ़ने का अवसर भी है। अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता शिष्य को अलौकिक लाभ से भर देता है। वेदों का विभाजन के अलावा वेदों, पुराणों और महाभारत जैसे महान ग्रंथों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित और विकसित कर दिव्य ज्ञान को जनसामान्य तक पहुंचाने का महान कार्य करने वाले महर्षि वेदव्यास जी महर्षि वेदव्यास जी की जयंती भी इसी दिन होती है । उनका योगदान भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की बड़ी उपलब्धियों में से एक है क्योंकि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। गुरु स्त्रोतम का एक प्रसिद्ध श्लोक न गुरोरधिकं तत्त्वं, न गुरोरधिकं तपः।तत्त्वज्ञानात् परं नास्ति, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ का अर्थ है कि गुरु से बड़ा कोई सत्य या तत्व नहीं है, गुरु से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है और तत्वज्ञान से बड़ा कुछ नहीं है। ऐसे आदरणीय श्री गुरु को मेरा प्रणाम है। गुरु पूर्णिमा एक धार्मिक अनुष्ठान के अलावा संस्कार, नैतिकता और अनुशासन के निर्माण का भी पर्व है। परिवार में प्रथम गुरु माता-पिता के बाद शिक्षक, मार्गदर्शक और समाज के प्रेरणास्रोत व्यक्ति हमारे जीवन को दिशा देने का काम करते हैं वे सभी हमारे गुरु हैं। आज रसातल में जाती नैतिकता और बढ़ती भौतिकता की वजह से गुरु पूर्णिमा और प्रासंगिक हो गई है। सफलता के अलावा व्यक्ति का जीवन, मूल्यों और संस्कारों समन्वय भी है। गुरु ही वह शक्तिपुंज है जो व्यक्ति को शिक्षित ही नहीं संस्कारित भी बनाती है। भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था पर भी गुरु पूर्णिमा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भारतीय राजनीति में “गुरु” की अवधारणा मार्गदर्शक नेतृत्व के रूप में भी है। एक सच्चा नेता या अगुवाई करने वाला वही होता है जो अपने अनुभव और ज्ञान से समाज को सही दिशा दे सके।अपने पथप्रदर्शक और सामाजिक और राष्ट्रीय मुखियाओं का उचित सम्मान भी गुरु सम्मान के सामान ही है। प्राचीन भारत में चाणक्य जैसे गुरु ने चंद्रगुप्त मौर्य को प्रशिक्षित कर एक सशक्त राष्ट्र की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज भी नीति-निर्माण में उसी विचारशीलता, नैतिकता और दूरदर्शिता की आवश्यकता है जो गुरु परंपरा से ही मिल सकती है। गुरु पूर्णिमा सत्ता का उद्देश्य शासन और समाज का मार्गदर्शन भी होता है। करउँ प्रनाम राम रघुवर को, गुरु पद रजु मन भावन।बिनु गुरु होइ न ज्ञान गुसाईं, यह सत्य कहेउँ मैं पावन॥ प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस की इन पंक्तियों में गुरु की महिमा और उनके चरणों की वंदना का सुंदर वर्णन करते हुए यह भी कहा गया है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिल सकता है। गुरु पूर्णिमा का ऐतिहासिक महत्व व्यापक है।इतिहास साक्षी है कि भारत की हर महान परंपरा के पीछे एक गुरु का मार्गदर्शन रहा है। वेदांत के आचार्य शंकर, भक्ति आंदोलन के संत कबीर, तुलसीदास और आधुनिक युग के स्वामी विवेकानंद इन सभी ने गुरु परंपरा को आगे बढ़ाकर समाज को नई दिशा दी है। काल चक्र में गुरुपूर्णिमा का संयोग हमेशा से विशिष्ट रहा है। इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था यही कारण है बौद्ध परंपरा में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। गुरु की अवधारणा सार्वभौमिक है और हर संस्कृति में ज्ञान और मार्गदर्शन का महत्व समान रूप से स्वीकार किया गया है। इनफोरमातिोन से भरपूर आज के डिजिटल युग में “ज्ञान” (Wisdom) की आवश्यकता और भी बढ़ गई है यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी हजारों वर्ष पहले थी। इंटरनेट और सोशल मीडिया हमें जानकारी दे सकता है लेकिन सही दिशा और विवेक केवल सदगुरु ही दे सकते हैं। आज के दौर में गुरु केवल पारंपरिक रूप में ही नहीं, बल्कि मेंटर, कोच और प्रेरणास्रोत के रूप में भी हमारे जीवन में उपस्थित हैं। इस अवसर में अपने जीवन में उन सभी व्यक्तियों के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए जिन्होंने किसी भी दशा परिस्थिति में हमें सही दिशा दिखाई हो। गुरु पूर्णिमा आत्ममंथन का अवसर भी है कि क्या हम अपने गुरु के बताए मार्ग पर चल रहे हैं? क्या हम अपने ज्ञान संसाधन और शक्ति का उपयोग समाज के कल्याण के लिए कर रहे हैं? भारतीय संस्कृति के अनुरूप गुरु को ईश्वर से भी ऊपर स्थान दिया गया है और आज के समय में जब हम सभी मूल्य और नैतिक चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं तब यह उचित भी है। जीवन में सफलता का वास्तविक अर्थ है सिर्फ़ भौतिक संसाधन का संग्रहण ही नही है उपलब्धियां नहीं बल्कि आत्मिक संतोष, नैतिकता और समाज के प्रति हमारा योगदान है और यह सब गुरुकृपा से ही संभव है। लेखक – संदीप अखिल, सलाहकार संपादक, न्यूज 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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