राष्ट्रवाणी: जीवन बीमा कंपनियों द्वारा किए गए कुल भुगतान में मृत्यु दावों का हिस्सा केवल सात प्रतिशत रहा, जबकि सरेंडर भुगतान …और पढ़ें जीवन बीमा कंपनियों ने ₹6.3 लाख करोड़ का कुल भुगतान किया। कुल भुगतान में मृत्यु दावों का हिस्सा मात्र सात प्रतिशत रहा। आधे से अधिक पॉलिसीधारक पांच साल से पहले पॉलिसी छोड़ देते हैं।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| जीवन बीमा कंपनियों ने कुल ₹6.3 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया है, जिसमें डेथ क्लेम का हिस्सा सिर्फ सात प्रतिशत रहा। वहीं, सरेंडर भुगतान का हिस्सा 37 प्रतिशत था। ये आंकड़े इरडा के हालिया कंसल्टेशन पेपर से लिए गए हैं।

कुल भुगतान में परिपक्वता लाभ का हिस्सा 35 प्रतिशत और 20 प्रतिशत एन्युटी व पेंशन भुगतान में गया। यानी पालिसी बीच में छोड़ने वाले ग्राहकों को लौटाई गई रकम, उन परिवारों को दी गई रकम से पांच गुना है जिनके पालिसीधारक की मौत हो गई। यह उस उद्योग के लिए असहज करने वाली सच्चाई होनी चाहिए, जिसके होने का पूरा तर्क ही यह है कि वह परिवार के कमाने वाले सदस्य की मौत के बाद परिवार को आर्थिक मुश्किलों से बचाती है।

कुल भुगतान के मुकाबले डेथ क्लेम (मृत्यु दावा) की रकम मामूली सी है। यह उद्योग असल में चाहे जो भी करता हो, मौत के जोखिम से सुरक्षा देना उसकी प्राथमिकताओं में बहुत नीचे है। पेपर में दिया गया एक दूसरा आंकड़ा पहले आंकड़े की वजह बताता है।

पूरे उद्योग में 61वें महीने पालिसी बने रहने का आंकड़ा 48 प्रतिशत है। यानी आधे से ज्यादा पालिसीधारक पांच साल पूरे होने से पहले ही प्रीमियम भरना बंद कर देते हैं। कुछ कंपनियों में तो 10वें साल तक चालू रहने वाली पालिसी सिर्फ आठ प्रतिशत रह जाती है।

लेकिन यह पेपर इस आंकड़े को बिक्री के हिसाब से भी अलग-अलग करके दिखाता है। जो पालिसी आनलाइन, बिना किसी एजेंट के खरीदी गईं, उनकी 61वें महीने की लगातार बने रहने की दर 71 प्रतिशत है। यानी जिसने खुद सोच-समझकर बीमा खरीदा, वह उसे बनाए रखता है।

48 और 71 के बीच का यह फासला, ग्राहक के फायदे वाली सलाह और बेचने वाले के फायदे वाली सलाह का फर्क दिखाता है। वजह साफ है। बचत से जुड़ी पालिसी पर पहले साल का कमीशन प्रीमियम का 25 से 37 प्रतिशत तक होता है और कुछ कंपनियों में पहले साल का कुल डिस्ट्रिब्यूशन खर्च 60 से 80 प्रतिशत के चौंकाने वाले स्तर तक पहुंच जाता है।

इन्हीं उत्पादों पर नवीनीकरण कमीशन सिर्फ 0 से 5 प्रतिशत है। जब सेल्स टीम को सारा पैसा पहले ही साल में मिल जाए और बाद में कुछ नहीं, तो उसका ध्यान पालिसी चालू रखवाने पर नहीं, बल्कि नई पालिसी बेचने पर ही रहेगा। फिर अगर नतीजा ठीक यही निकला है, तो इसमें किसी को हैरानी क्यों होनी चाहिए?

जो लोग पांच साल पर पालिसी छोड़ते हैं, उन्हें आमतौर पर अपना चुकाया हुआ प्रीमियम भी पूरा वापस नहीं मिलता। रिटर्न की तो बात ही छोड़िए। उद्योग अपने बचाव में कहता है कि ये बचत उत्पाद हैं।

इन्हें सुरक्षा के पैमाने पर परखना ठीक नहीं। यही दलील असल में इस बात को साबित कर देती है कि एक ऊंचे कमीशन वाला निवेश उत्पाद, जिसमें ऊपर से थोड़ा सा बीमा जोड़ दिया गया हो और जिसे बीमा कंपनी बेचे, अपनी बनावट से ही मिस-सेलिंग है। यह न तो निवेश का काम ठीक से करता है और न ही सुरक्षा का।

इसमें से कुछ भी पालिसी बेचने वाले लोगों की आलोचना नहीं है। वे उसी ढांचे और इंसेंटिव के भीतर काम करते हैं जो उनके लिए बनाया गया है। यह पेपर उसी नतीजे की ओर इशारा करता है जिस पर हर समझदार बचत करने वाला पहले ही पहुंच चुका था: सीधा-सादा टर्म इंश्योरेंस, हमेशा से और हमेशा रहेगा।

अकेला ऐसा बीमा उत्पाद जो समझ में आता है, क्योंकि सिर्फ वही असल में जीवन बीमा है।

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