सरदार पटेल ने एक बार कहा था कि एकता के बिना मनुष्य बल कोई शक्ति नहीं है, जब तक वह उचित रूप से समन्वित और संगठित ना हो जाए, तब वह एक आध्यात्मिक शक्ति बन जाता है। उनके लिए राष्ट्र की सच्ची शक्ति केवल सीमाओं में नहीं बल्कि उसके लोगों की एकता में निहित थी। 2014 में भारत सरकार ने सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इसका उद्देश्य देशवासियों में एकता की भावना को पुनर्जीवित करना और पटेल की “एक भारत श्रेष्ठ भारत” की दृष्टि को सम्मानित करना था। इस दिन शैक्षणिक संस्थानों से लेकर सेना और विभिन्न समुदायों में देशभर में “रन फॉर यूनिटी” सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनी और शपथ समारोह आयोजित किए जाते हैं।

सैकड़ों रियासतों में बंटे और आपस में लड़ते झगड़ते अनेक राजाओं को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिल भी जाती तो क्या अखण्ड भारत का यह स्वरूप होता जिसे हम भारतीय गणराज्य के रूप में जानते हैं। अनेक क्रांतिकारियों के बलिदान, गांधीजी के लगातार आंदोलन व तत्कालीन प्रणेताओं की कूटनीतियों से अंग्रेज पस्त होकर देश आजाद तो कर गये पर इन बिखरे राज्यों व अपनी अपनी सत्ता की सार्वभौमिकता को ही सर्वोपरि मानने वाले अलग-अलग राज्यों से एक अखंड भारत के निर्माण की परिकल्पना एक वृहत् स्वप्नदृष्टा ही कर सकता था। देश का सौभाग्य हैं कि तब हमारे देश में लौहपुरुष सरदार पटेल जैसा स्वप्न दृष्टा मौजूद था, जिसके पास एक पैनी दृष्टि, विवेकपूर्ण सोच और अपने निर्णयों को लागू करा लेने की दृढ संकल्प शक्ति थी। दृढ़ निश्चय से वे धीरे-धीरे 560 से अधिक रियासतों का अखंड भारत में विलय करते गए। जूनागढ़, जम्मू कश्मीर और हैदराबाद के विलय लिए उन्होंने अपनी सारी योग्यता लगायी तब जाकर ये बड़ी रियासतें भारत का अंग बन पायी और भारत वर्तमान स्वरूप में आ पाया। यह एक ऐसा कार्य था जिसके लिए अद्वितीय कूटनीति, साहस और दृढ़ निश्चय की आवश्यकता थी। उनकी स्थिर दृष्टि और दृढ़ संकल्प ने उन्हें लौह पुरुष का खिताब दिलाया। हर साल 31 अक्टूबर को भारत राष्ट्रीय एकता दिवस मनाता है ताकि उनकी जयंती का सम्मान किया जा सके।

एक ऐसा नेता जिनकी दूर दृष्टि और दृढ़ निश्चय ने एक एकीकृत भारत की नींव रखी। सरदार पटेल ने एक बार कहा था कि एकता के बिना मनुष्य बल कोई शक्ति नहीं है, जब तक वह उचित रूप से समन्वित और संगठित ना हो जाए, तब वह एक आध्यात्मिक शक्ति बन जाता है। उनके लिए राष्ट्र की सच्ची शक्ति केवल सीमाओं में नहीं बल्कि उसके लोगों की एकता में निहित थी। 2014 में भारत सरकार ने सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इसका उद्देश्य देशवासियों में एकता की भावना को पुनर्जीवित करना और पटेल की “एक भारत श्रेष्ठ भारत” की दृष्टि को सम्मानित करना था। इस दिन शैक्षणिक संस्थानों से लेकर सेना और विभिन्न समुदायों में देशभर में “रन फॉर यूनिटी” सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनी और शपथ समारोह आयोजित किए जाते हैं।

वैसे तो स्वतंत्रता प्राप्त होने के पश्चात ही सरदार पटेल का यथेष्ठ सम्मान देश को करना था और उनका महत्व स्थापित करना था। 2014 में सरकार ने इस लौह पुरुष को सम्मानित किए जाने की मुकम्मल व्यवस्था की। उस दिन मुख्य समारोह गुजरात के एकता नगर स्थित “स्टैचू ऑफ यूनिटी” पर आयोजित किया जाता है जो भारत की शक्ति साहस और सामूहिक संकल्प का प्रतीक है। यह स्टैचू विश्व में सबसे ऊंचा 182 मीटर ऊंचाई का बनाया गया है जिसे देखकर भारत की छाती गर्व से फूल उठती है। सरदार पटेल का कहना था “धर्म के मार्ग पर चलो सत्य और न्याय के मार्ग पर क्योंकि वही सभी के लिए सही मार्ग है।” उनके ये शब्द हमें याद दिलाते हैं कि भारत के सामाजिक ताने-बाने में न्याय, परस्पर सम्मान और शांति बनाए रखना हम सब की साझा जिम्मेदारी है। एकता दिवस उस भारत के विचार को पुनर्स्थापित करता है जो अपनी विविधता के कारण फलता फूलता है ना कि उसके बिना।

यह दिन हर नागरिक को राष्ट्रीय एकता के प्रति समर्पण की याद दिलाता है। भारत की सांस्कृतिक विविधता को समझने और भाषा क्षेत्र और धर्म के बीच बंधन मजबूत करने का आवाहन करता है। यद्यपि एकता दिवस में वाद-विवाद, निबंध प्रतियोगिता, परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं किंतु मात्र इन औपचारिकताओं से मूल उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होती। आज जब भारत क्षेत्रीय असमानताओं, सामाजिक विभाजनों और वैचारिक मतभेदों जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब एकता दिवस का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है यह केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं है, राष्ट्रीय एकता और सामूहिक प्रगति की भावना को पुनर्जीवित करने का अवसर है। यह संदेश देता है कि भारत चाहे जितना विशाल और विविध हो उसका दिल और आत्मा एक है इसे आत्मसात करने की आवश्यकता है।

पटेल के शब्द आज भी प्रेरणादायक है वह कहा करते थे “मेरी केवल एक इच्छा है कि भारत एक अच्छा उत्पादक बने और देश में कोई भूखा ना रहे किसी की आंखों में आंसू ना हो।” उनका दयालु राष्ट्रवाद सेवा और एकता पर आधारित नेतृत्व का सर्वोत्तम उदाहरण है। विखंडित हो रहे विश्व समुदाय के लिए यह दिन और श्री पटेल के विचार एक अखंड विश्व की कल्पना को साकार करते हैं। विभाजित होती दुनिया में पटेल का उदाहरण हमें अनुशासन एकजुटता और सामूहिक नियति में विश्वास का संदेश देता है। लौह पुरुष पटेल की कल्पित एकता कोई स्थिर आदर्श नहीं बल्कि एक जीवंत शक्ति है उनके यह शब्द आज भी गूंजते हैं कि कार्य ही पूजा है, श्रम ही ईश्वर है और जो व्यक्ति सही भावना से कार्य करता है वह सदैव शांत और प्रसन्न रहता है। ये वचन हर पीढ़ी को राष्ट्र की प्रगति और एकता में योगदान देने का आव्हान करते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल की विरासत इतिहास से परे है। वह भारत की आत्मा में जीवित है।

हर वर्ष एकता दिवस यह सुनिश्चित करता है कि यह भावना कभी मंद ना पड़े। भारत सदैव एक रहे और पटेल का स्वप्निल सामंजस्य सदैव हमारा मार्गदर्शक बना रहे। इन शब्दों से न केवल भारत बल्कि विश्व को भी प्रेरणा लेनी चाहिए ताकि विश्व में जो विभाजन के लकीरें खींची हैं, उनसे उबरकर विश्व भी एक शांतिपूर्ण कुटुंब बन सकें।

– लेखक छत्तीसगढ़ पुलिस के रिटायर्ड है




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