नयी दिल्ली. केंद्र ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि कई राज्य सरकारों और उनकी संस्थाओं के अलावा अन्य ने भी रक्षा भूमि पर अतिक्रमण किया है और उन्हें हटाने के प्रयास किए जा रहे हैं. न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त स्वतंत्र समिति को रक्षा भूमि पर अतिक्रमण हटाने के लिए उठाए गए कदमों की निगरानी करने और दो सप्ताह में अपनी अंतरिम रिपोर्ट दाखिल करने को कहा.
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमण ने पीठ को बताया कि समिति अतिक्रमण किए गए स्थलों का दौरा कर रही है और अतिक्रमणों की पहचान कर रही है, लेकिन उसे कुछ प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए न्यायालय के कुछ निर्देश और हस्तक्षेप आवश्यक हैं.
वर्ष 2014 में देश भर में रक्षा भूमि पर कथित अतिक्रमण की जांच के लिए जनहित याचिका दायर करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि समिति को बारीकी से विचार करना होगा.
उन्होंने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि एक स्वतंत्र नियामक संस्था की आवश्यकता है.
पीठ ने भूषण से कहा कि जो भी संस्था गठित की जाएगी, उसे स्थानीय राजस्व अधिकारियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की मदद लेनी होगी.
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 10 नवंबर के लिए निर्धारित करते हुए कहा, ”अंतरिम रिपोर्ट दाखिल होने के बाद, हम देखेंगे कि क्या निर्देश जारी किए जा सकते हैं.” केंद्र ने 30 जुलाई को अपने हलफनामे में अदालत को सूचित किया था कि देश में 75,629 एकड़ रक्षा भूमि में से 2,024 एकड़ भूमि पर वर्तमान में व्यक्तियों ने अतिक्रमण कर रखा है, और 1575 एकड़ भूमि उन लोगों के अनधिकृत कब्जे में है जिन्होंने कृषि उद्देश्यों के लिए भूमि पट्टे पर ली थी.
