मुंबई/इंदौर. मुंबई की एक विशेष अदालत ने सितंबर 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी सातों आरोपियों को बृहस्पतिवार को बरी कर दिया. इस विस्फोट में छह लोग मारे गए थे और 101 अन्य घायल हुए थे.
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) के मामलों की सुनवाई के लिए नियुक्त विशेष न्यायाधीश ए के लाहोटी ने अभियोजन पक्ष के मामले और जांच में कई खामियों को उजागर किया और कहा कि आरोपी व्यक्ति संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं. मुंबई से लगभग 200 किलोमीटर दूर मालेगांव शहर में 29 सितंबर 2008 को एक मस्जिद के पास एक मोटरसाइकिल में लगाए गए विस्फोट उपकरण में विस्फोट होने से छह लोगों की मौत हो गयी थी और 100 से अधिक लोग घायल हो गए थे. न्यायाधीश ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि मामले को संदेह से परे साबित करने के लिए कोई ”विश्वसनीय और ठोस” सबूत नहीं है. अदालत ने कहा कि इस मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधान लागू नहीं होते.
मालेगांव विस्फोट मामले में सभी आरोपी बरी, प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित ने दिया अदालत को धन्यवाद
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित ने 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में उन्हें बरी करने के विशेष अदालत के आदेश की बृहस्पतिवार को सराहना की. पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकु ने कहा कि बरी होना सिफ.र् उनकी ही नहीं, बल्कि ‘भगवा की जीत है.
उन्होंने यह भी कहा कि उनके जीवन के 17 साल बर्बाद गए और भगवान उन लोगों को सज़ा देंगे जिन्होंने ‘भगवा’ का अपमान करने की कोशिश की. फैसले के बाद ठाकुर, पुरोहित और अन्य पांच आरोपियों ने विशेष एनआईए न्यायाधीश ए के लाहोटी और अपने वकीलों को धन्यवाद दिया. ठाकुर ने अदालत को बताया कि 2008 में इस मामले में गिरफ्तारी के बाद से उनका जीवन बर्बाद हो गया था और वह केवल इसलिए जीवित रह पाईं क्योंकि वह एक सन्यासी थीं.
उन्होंने कहा, “यह केस सिर्फ मैंने नहीं लड़ा, बल्कि भगवा ने लड़ा. मेरा पूरा जीवन कलंकित कर दिया गया था.” ठाकुर ने अदालत से कहा, “आज भगवा की विजय हुई है, न्याय की जीत हुई है. जिसने भी भगवान को बदनाम किया है, भगवान उसे सजा देगा.” पुरोहित ने कहा कि उन्हें इस मामले में फंसाया गया है और उन्होंने कहा कि वह पहले की तरह और उसी जोश के साथ देश की सेवा करते रहेंगे.
उन्होंने कहा, “कोई भी जांच एजेंसी गलत नहीं है; इन एजेंसियों में काम करने वाले लोग ही गलत हैं. यह देश महान है. हमें ध्यान रखना चाहिए कि गलत लोग ऊंचे पदों पर न पहुंचें और हमारे जैसे लोगों को कष्ट न पहुंचाएं.” पुरोहित ने कहा कि वह संगठन और राष्ट्र की सेवा करना जारी रखेंगे. पुरोहित को मुकदमा लंबित रहने तक सेना में बहाल कर दिया गया था.
मालेगांव विस्फोट मामला : पांच न्यायाधीश, दो एजेंसियां और 17 साल लंबा इंतजार
महाराष्ट्र के मालेगांव में 2008 के बम विस्फोट मामले में लगभग 17 वर्ष तक चले मुकदमे के दौरान न केवल जांच एजेंसियां बदलीं, बल्कि पांच अलग-अलग न्यायाधीशों ने भी मामले पर सुनवाई की. एक विशेष अदालत ने इस मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी सातों आरोपियों को बृहस्पतिवार को बरी करते हुए कहा कि उनके खिलाफ कोई ”विश्वसनीय और ठोस सबूत नहीं हैं.” शुरुआत में मामले की जांच महाराष्ट्र के आतंकवाद-निरोधी दस्ते (एटीएस) ने की थी, जिसने ‘अभिनव भारत’ समूह के सदस्य रहे दक्षिणपंथी चरमपंथियों पर दोष मढ़ा था.
बाद में जांच एनआईए को सौंप दी गई, जिसने ठाकुर को क्लीन चिट दे दी थी. हालांकि, अदालत ने प्रथम दृष्टया सबूतों का हवाला देते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाया. प्रारंभ में अभियुक्तों को रिमांड पर भेजने से लेकर आरोप-पत्र दाखिल करने, आरोप तय करने, मुकदमे की शुरुआत और अंतत? फैसला सुनाये जाने तक, यह मामला 2008 से 2025 के बीच पांच न्यायाधीशों की नजरों से गुजरा. विस्फोट के पीड़ितों और अभियुक्तों, दोनों ने न्यायाधीशों के बार-बार बदले जाने को मुकदमे की गति धीमी करने और इसमें लंबी देरी का एक महत्वपूर्ण कारण बताया.
आरोपियों में से एक, समीर कुलकर्णी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि यह सबसे लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों में से एक था. उन्होंने अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष, दोनों पर मुकदमे में तेज़ी लाने में विफल रहने का आरोप लगाया. कुलकर्णी ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करके मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने का भी अनुरोध किया था. कुलकर्णी को आखिरकार मामले में बरी कर दिया गया है. विस्फोट के कई पीड़ितों की पैरवी करने वाले अधिवक्ता शहीद नदीम ने स्वीकार किया कि न्यायाधीशों के बार-बार तबादले से मुकदमे में वास्तव में बाधा आई. उन्होंने बताया कि मामले में भारी-भरकम रिकॉर्ड के कारण हर नए न्यायाधीश को नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ी, जिससे प्रक्रिया में और देरी हुई.
इस मामले की सुनवाई करने वाले पहले विशेष न्यायाधीश वाई. डी. शिंदे थे. उन्होंने पूर्व भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और अन्य अभियुक्तों की प्रारंभिक रिमांड को लेकर फैसले दिए थे. न्यायाधीश शिंदे ने एक महत्वपूर्ण फैसले में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के इस्तेमाल को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि कोई भी आरोपी किसी संगठित अपराध गिरोह का हिस्सा नहीं था.
उन्होंने कहा कि मकोका लगाने की यह कानूनी शर्त कि किसी आरोपी के खिलाफ एक से ज़्यादा आरोप-पत्र दाखिल होने चाहिए, पूरी नहीं हुई. हालांकि, बाद में राज्य सरकार की अपील पर बंबई उच्च न्यायालय ने मकोका को बहाल कर दिया था. न्यायाधीश शिंदे के बाद विशेष न्यायाधीश एस.डी. टेकाले ने 2015 से 2018 तक इस मामले की सुनवाई की, जब तक कि वार्षिक न्यायिक नियुक्तियों के दौरान उनका तबादला नहीं हो गया.
न्यायाधीश टेकाले ने ही प्रज्ञा ठाकुर को क्लीन चिट देने के राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) के फैसले को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि प्रथम दृष्टया उन पर मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं. इसके बाद, विशेष न्यायाधीश वी.एस. पडलकर ने कार्यभार संभाला और अक्टूबर 2018 में ठाकुर, पुरोहित और पांच अन्य के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए. उनके कार्यकाल में पहले गवाह से पूछताछ के साथ मुकदमा आधिकारिक रूप से शुरू हुआ.
न्यायाधीश पी.आर. सित्रे ने 2020 में पडलकर की सेवानिवृत्ति के बाद उनका स्थान लिया. हालांकि, कोविड-19 महामारी के कारण मुकदमे में कुछ समय के लिए रुकावट आई. इन चुनौतियों के बावजूद, न्यायाधीश सित्रे ने अपने एक साल से थोड़े अधिक समय के कार्यकाल में 100 गवाहों से पूछताछ की.
जब 2022 में न्यायाधीश सित्रे का तबादला होना था, तो विस्फोट पीड़ितों ने बंबई उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि आगे मुकदमे में और देरी से बचने के लिए तबादले पर रोक लगाई जाए. न्यायाधीश सित्रे के तबादले के बाद, विशेष न्यायाधीश ए. के. लाहोटी ने जून 2022 में मुकदमे की सुनवाई अपने हाथ में ले ली. अप्रैल 2025 तक न्यायाधीश लाहोटी ने मुकदमे की सुनवाई जारी रखी.
अप्रैल में जब उनका नासिक तबादला होना था, तब पीड़ितों ने उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को फिर से पत्र लिखकर तबादले पर रोक लगाने का अनुरोध किया, क्योंकि मुकदमा लगभग पूरा होने वाला था. उनकी याचिका पर विचार करते हुए विशेष एनआईए न्यायाधीश के रूप में न्यायाधीश लाहोटी का कार्यकाल अगस्त 2025 के अंत तक बढ़ा दिया गया, जिससे उन्हें मुकदमा पूरा करने की अनुमति मिल गई.
प्रज्ञा और अन्य पर आतंकवादी कृत्य और हत्या के आरोप में मुकदमे के विवरण
देश में सबसे लंबे समय तक चले आतंकवादी मामलों में से एक 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में सात लोगों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत आतंकवादी कृत्य को अंजाम देने और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत हत्या एवं आपराधिक साजिश रचने के आरोप में मुकदमे चलाये गये.
मुंबई से लगभग 200 किलोमीटर दूर मालेगांव शहर में 29 सितंबर 2008 को एक मस्जिद के पास एक मोटरसाइकिल पर लगाए गए विस्फोटक उपकरण में विस्फोट हुआ था, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई और 101 घायल हुए थे. अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि यह विस्फोट दक्षिणपंथी चरमपंथियों ने किया था और उनका उद्देश्य ‘आर्यावर्त’ (हिंदू राष्ट्र) की स्थापना करना था.
इस मामले में कुल 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन केवल सात लोगों पर ही मुकदमा चला, क्योंकि आरोप तय होने के समय बाकी सात को बरी कर दिया गया था. विशेष अदालत ने बृहस्पतिवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया तथा कहा कि उन्हें (आरोपियों को) दोषी साबित करने के लिए (पर्याप्त) सबूत नहीं है. मुकदमे का सामना करने वाले सात आरोपियों का ब्योरा इस प्रकार है-
(1) प्रज्ञा सिंह ठाकुर: उन्हें अक्टूबर 2008 में प्रारंभिक जांच एजेंसी -महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने गिरफ्तार किया था. उन पर आरोप था कि जिस मोटरसाइकिल पर बम रखा गया था वह उनके नाम पर पंजीकृत थी. अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि ठाकुर ने मामले के सह-आरोपियों के साथ भोपाल में एक बैठक में भी भाग लिया था, जहां इस बात पर चर्चा हुई थी कि 2006 में मालेगांव में किए गए विस्फोट का मुस्लिम समुदाय से बदला लिया जाना चाहिए. इस बैठक के दौरान ठाकुर ने कथित तौर पर कहा था कि वह विस्फोट करने के लिए लोग उपलब्ध कराएंगी.
राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण (एनआईए) द्वारा मामले की जांच अपने हाथ में लेने के बाद उसने 2016 में ठाकुर को क्लीन चिट देने की कोशिश की. हालांकि, एक विशेष अदालत ने इनकार करते हुए कहा कि ठाकुर को मुकदमे का सामना करना होगा. बंबई उच्च न्यायालय से 25 अप्रैल 2017 को जमानत मिलने से पहले ठाकुर ने आठ साल से ज़्यादा वक्त जेल में बिताया. ठाकुर ने 2019 में भाजपा के टिकट पर भोपाल से लोकसभा चुनाव जीता और बाद में सांसद के रूप में शपथ ली. हालांकि उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं दिया गया.
(2) प्रसाद श्रीकांत पुरोहित: जब उन्हें एटीएस ने गिरफ्तार किया था तब वह भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर कार्यरत थे. उनके खिलाफ उन बैठकों में शामिल होने का आरोप था, जहां विस्फोट की कथित साजिश रची गई थी. पुरोहित को नवंबर 2008 में गिरफ्तार किया गया था और सितंबर 2017 में उच्चतम न्यायालय ने उन्हें जमानत दे दी थी. अदालत को दिए अपने अंतिम बयान में, पुरोहित ने आरोप लगाया कि पूछताछ के दौरान एटीएस के वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया. उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष ने उनके खिलाफ झूठा मामला गढ़ा है.
(3) रमेश उपाध्याय: वह एक सेवानिवृत्त सेना मेजर हैं. उनपर भी भोपाल में एक बैठक में शामिल होने का आरोप था, जहां साज़शि रची गई थी. अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि उपाध्याय ने “हिंदू राष्ट्र” के गठन के लिए जोर दिया था.
(4) समीर कुलकर्णी: उनके खिलाफ भी उन बैठकों में शामिल होने का आरोप था, जहां कथित साज़शि रची गई थी और योजना पर चर्चा हुई थी. उन्हें अक्टूबर 2008 में गिरफ़्तार किया गया था और सितंबर 2017 में बंबई उच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत दे दी थी.
(5) अजय राहिरकर: वह कथित तौर पर ‘अभिनव भारत’ संगठन के कोषाध्यक्ष थे. उनपर आरोपी प्रसाद पुरोहित के निर्देश पर धन इकट्ठा करने और उसे सह-अभियुक्तों को उनकी गैरकानूनी गतिविधियों के लिए हथियार और विस्फोटक खरीदने हेतु वितरित करने का आरोप था. उन्हें दो नवंबर 2008 को गिरफ्तार किया गया था और 11 नवंबर 2011 से वह जमानत पर थे.
(6) सुधाकर द्विवेदी: उनपर नासिक में एक बैठक में शामिल होने का आरोप था, जहां सह-आरोपी पुरोहित ने कथित तौर पर मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों के वीडियो दिखाए थे.
(7) सुधाकर चतुर्वेदी: उनपर भी नासिक में हुई बैठक में मौजूद रहने का आरोप था. उन्हें नवंबर 2008 में गिरफ्तार किया गया था और 2017 में एक विशेष अदालत ने उन्हें जमानत दी थी.
मालेगांव में 2008 में हुए विस्फोट मामले का घटनाक्रम
मालेगांव में 2008 के विस्फोट मामले का घटनाक्रम इस प्रकार है, जिसमें बृहस्पतिवार को राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की एक विशेष अदालत ने सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया.
29 सितंबर 2008: महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव में एक मोटरसाइकिल पर लगाए गए बम में विस्फोट हो गया. छह लोग मारे गए और 101 घायल हुए.
30 सितंबर 2008: मालेगांव के आज़ाद नगर पुलिस थाने में एक प्राथमिकी दर्ज की गई.
21 अक्टूबर 2008: महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने मामले की जांच अपने हाथ में ली.
23 अक्टूबर 2008: एटीएस ने मामले में पहली गिरफ़्तारी की. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और तीन अन्य को गिरफ़्तार किया गया. एटीएस ने दावा किया कि विस्फोट दक्षिणपंथी चरमपंथियों ने किया था.
नवंबर 2008: लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित को विस्फोट की साजिश में कथित संलिप्तता के आरोप में एटीएस ने गिरफ्तार किया.
20 जनवरी 2009: एटीएस ने प्रज्ञा ठाकुर और पुरोहित सहित 11 गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ विशेष अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया. आरोपियों पर महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका), गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की कठोर धाराओं के तहत आरोप लगाए गए.
दो व्यक्तियों- रामजी उर्फ रामचंद्र कलसांगरा और संदीप डांगे को वांछित अभियुक्त बताया गया.
जुलाई 2009: विशेष अदालत ने कहा कि इस मामले में मकोका के प्रावधान लागू नहीं होते और अभियुक्तों पर नासिक की एक अदालत में मुकदमा चलाया जाएगा.
अगस्त 2009: महाराष्ट्र सरकार ने विशेष अदालत के आदेश के खिलाफ बंबई उच्च न्यायालय में अपील दायर की.
जुलाई 2010: बंबई उच्च न्यायालय ने विशेष अदालत के आदेश को पलट दिया और मकोका के तहत आरोपों को बरकरार रखा.
अगस्त 2010: पुरोहित और प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने उच्च न्यायालय के आदेश के के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख किया.
एक फरवरी 2011: एटीएस मुंबई ने एक और व्यक्ति प्रवीण मुतालिक को गिरफ़्तार किया. तब तक कुल 12 लोग गिरफ़्तार.
13 अप्रैल 2011: राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने मामले की जांच अपने हाथ में ले ली.
फरवरी और दिसंबर 2012: एनआईए ने दो और लोगों लोकेश शर्मा और धन सिंह चौधरी को गिरफ़्तार किया. तब तक कुल 14 गिरफ़्तारियां हो चुकी थीं.
अप्रैल 2015: उच्चतम न्यायालय ने मकोका की उपयुक्तता पर पुर्निवचार के लिए मामला विशेष अदालत को वापस भेज दिया.
फरवरी 2016: एनआईए ने विशेष अदालत को बताया कि उसने इस मामले में मकोका के प्रावधानों को लागू करने के बारे में अटॉर्नी जनरल की राय ले ली है.
13 मई 2016: एनआईए ने विशेष अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किया. मामले से मकोका के आरोप हटा दिए गए. सात आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गई.
25 अप्रैल 2017: बंबई उच्च न्यायालय ने प्रज्ञा ठाकुर को ज़मानत दे दी. उच्च न्यायालय ने पुरोहित को ज़मानत देने से इनकार कर दिया.
21 सितंबर 2017: पुरोहित को उच्चतम न्यायालय से ज़मानत मिली. साल के अंत तक सभी गिरफ्तार आरोपी ज़मानत पर बाहर आ गए.
27 दिसंबर 2017: विशेष एनआईए अदालत ने आरोपी शिवनारायण कलसांगरा, श्याम साहू और प्रवीण मुतालिक नाइक को मामले से बरी कर दिया. अदालत ने यूएपीए के तहत आतंकवादी संगठन का सदस्य होने और आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन जुटाने से संबंधित आरोप भी हटा दिए.
30 अक्टूबर 2018: सात आरोपियों ठाकुर, पुरोहित, रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी और सुधाकर चतुर्वेदी के खिलाफ आरोप तय किए गए. उन पर आतंकवादी कृत्य करने के लिए यूएपीए के तहत और आपराधिक साजिश व हत्या के लिए भादसं के तहत मुकदमा चलाया गया.
तीन दिसंबर 2018: मामले के पहले गवाह की पूछताछ के साथ मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई.
14 सितंबर 2023: अभियोजन पक्ष के 323 गवाहों (जिनमें से 37 मुकर गए) से जिरह के बाद अभियोजन पक्ष ने अपनी गवाही बंद करने का फैसला किया.
23 जुलाई, 2024: बचाव पक्ष के आठ गवाहों से जिरह पूरी हुई.
12 अगस्त 2024: विशेष अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अभियुक्तों के अंतिम बयान दर्ज किए. मामले में अभियोजन और बचाव पक्ष की अंतिम दलीलों के लिए सुनवाई की तारीख दी गयी.
19 अप्रैल 2025: विशेष अदालत ने निर्णय के लिए सुनवाई बंद कर दी.
31 जुलाई 2025: विशेष एनआईए न्यायाधीश ए. के. लाहोटी ने ठाकुर और पुरोहित सहित सभी सात आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि दोषसिद्धि के लिए कोई ”ठोस और विश्वसनीय” सबूत नहीं थे. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है.
वांछित आरोपी के बेटे ने पूछा, ‘मेरी मां खुद को सुहागिन माने या विधवा”
जुलाई (भाषा) महाराष्ट्र के मालेगांव में वर्ष 2008 में हुए बम विस्फोट मामले में वांछित आरोपी रामजी कलसांगरा के बेटे ने बृहस्पतिवार को कहा कि उसके पिता का पिछले 17 साल से कोई सुराग नहीं है और परिवार उनके ‘लापता’ होने के मामले में अब भी न्याय का इंतजार कर रहा है. कलसांगरा के बेटे देवव्रत ने इंदौर में ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि अदालत के इस फैसले के बाद दूध का दूध और पानी का पानी’ हो गया है. उन्होंने कहा कि यह साबित हो गया है कि ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी कोई अवधारणा कभी वजूद में नहीं थी.
देवव्रत ने बताया, ”वर्ष 2008 से लेकर अब तक मेरा पूरा परिवार इस संशय से जूझ रहा है कि मेरे पिता जिंदा हैं भी या नहीं? अब इससे बड़ी प्रताड़ना क्या होगी कि पिछले 17 साल से हमें उनके बारे में कोई भी जानकारी नहीं है.” देवव्रत ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के जांच अधिकारियों ने उनके पिता का पता पूछने के नाम पर उनके परिवार को लंबे समय तक बहुत परेशान किया था.
उन्होंने कहा, “मैं महाराष्ट्र एटीएस के तत्कालीन जांच अधिकारियों से पूछना चाहता हूं कि मेरी मां खुद को सुहागिन माने या विधवा?” देवव्रत ने संदेह जताया कि महाराष्ट्र एटीएस ने उनके पिता को अवैध तौर पर हिरासत में रखा और इस दौरान उनके साथ कोई अनहोनी हो गई.
उन्होंने अपने पिता के ‘लापता’ होने के मामले की जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किये जाने की मांग की. देवव्रत ने कहा,”हमें अब भी न्याय का इंतजार है. मेरी मां, मेरे दोनों भाइयों और दादा-दादी को अब भी उम्मीद है कि एक न एक दिन मेरे पिता के बारे में कोई पक्की खबर जरूर आएगी.” उन्होंने बताया कि इंदौर के बंगाली चौराहा क्षेत्र में रहने वाले कलसांगरा मूलत? किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं और 17 साल पहले ‘लापता’ होने से पहले बिजली मिस्त्री के तौर पर काम करते थे.
