राष्ट्रवाणी: Gautam Ad Jain family: गौतम अदाणी का जन्म अहमदाबाद में एक सीमित संसाधनों वाले जैन परिवार में हुआ था, जहाँ …और पढ़ें गौतम अदाणी का जैन समुदाय से संबंध: व्यापारिक मूल्यों और उद्यमी भावना की कहानी जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| 1962 में अहमदाबाद में जन्मे गौतम अदाणी एक सीमित साधनों वाले परिवार से आए थे।
उनके पिता शांतिलाल अदाणी के सातवें बच्चे गौतम अदाणी (gautam ad) थे, जबकि राजेश सबसे छोटे थे। गौतम अदाणी कुल 5 भाई हैं, उनकी दो बहनें भी हैं। परिवार के पास इतना बड़ा पूंजी आधार नहीं था कि गौतम सीधे कोई बड़ा कारोबार शुरू कर सकें।
लेकिन उनके शुरुआती सालों की कहानी बताती है कि परिवार, समुदाय और कारोबार को देखने का उनका नजरिया धीरे-धीरे कैसे बना। गौतम का परिवार कमोडिटी ट्रेडिंग से जुड़ा था। कारोबार की शुरुआत अरंडी के बीज के फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट (Gautam Ad commodity trading) से हुई और 1960 के दशक के आखिर तक परिवार ने टेक्सटाइल ट्रेडिंग का रुख कर लिया था।
उस दौर में कपास, कपड़े, प्रोसेसिंग और गारमेंट्स जैसे कारोबार भारतीय उद्योग का अहम हिस्सा थे। लेखक आरएन भास्कर अपनी किताब ‘गौतम अदाणी- रिमैजिनिंग बिजनेस इन इंडिया एंड द वर्ल्ड’ में लिखते हैं कि गौतम अदाणी का जन्म जैन परिवार में हुआ था। एक ऐसा समुदाय, जिसने अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ बेहतरीन प्रोफेशनल्स, उद्योगपतियों और रत्न एवं आभूषण कारोबार से जुड़े उद्यमियों को पैदा किया।
हीरों की कटिंग, पॉलिशिंग और उनसे जुड़े एक्सपोर्ट-इंपोर्ट कारोबार का लगभग पूरा हिस्सा पालनपुरी जैन (Jain community business values) कहे जाने वाले समुदाय के एक वर्ग के नियंत्रण में है। “इस समुदाय में कारोबार आमतौर पर आपसी भरोसे और मौखिक वादे के आधार पर होता है। बोली गई बात लिखित यानी किसी कॉन्ट्रैक्ट जितनी ही पवित्र मानी जाती है।
कॉरपोरेट दुनिया में जहां लिखित कॉन्ट्रैक्ट पर विवाद हो सकता है, वहीं इस समुदाय के भीतर किया गया मौखिक करार शायद ही कभी तोड़ा जाता है। अगर कोई व्यक्ति सौदे से पीछे हटता, तो उसके साथ दोबारा कारोबार करना मुश्किल हो सकता था, जब तक मजबूत गारंटी न हो। परिवार और समुदाय मुश्किल समय में किसी सदस्य की मदद करके उसके कारोबार और परिवार के नाम को संभालने की कोशिश करते थे।” आरएन भास्कर के मुताबिक, गौतम अदाणी थराड जैन समुदाय से आते हैं।
यह समुदाय गुजरात के बनासकांठा जैसे अपेक्षाकृत कठिन और सूखे इलाके से आया था। लेखक आरएन भास्कर अपनी किताब ‘गौतम अदाणी- रिमैजिनिंग बिजनेस इन इंडिया एंड द वर्ल्ड’ में लिखते हैं कि सीमित संसाधनों के बीच रहने की परिस्थितियों ने इस समुदाय में संसाधनों के सावधानी से इस्तेमाल और कारोबार में नए तरीके अपनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।
समुदाय के ज्यादातर लोग अपना कारोबार करते थे और नौकरी की तलाश कम ही करते थे। गौतम की स्कूली पढ़ाई डीसा में हुई, जहां परिवार कमोडिटी ट्रेडिंग का कारोबार करता था। पढ़ाई में उन्हें अच्छा माना जाता था।
लेकिन 1978 की गर्मियों की छुट्टियों में उनके सामने करियर (Gautam Ad 1978 decision) को लेकर एक बड़ा सवाल था- आगे क्या किया जाए? तभी उनके मामा ने उन्हें एक अलग रास्ते पर सोचने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने गौतम को बताया कि उनके बड़े भाई यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के बाद भी परिवार के कारोबार में लौट आए थे।
ऐसे में गौतम भी किसी कारोबार में हाथ आजमाकर अपना रास्ता तलाश सकते थे। किशोरावस्था में ही गौतम के स्वभाव में चुनौती स्वीकार करने और दूसरों से आगे निकलने की इच्छा दिखाई देने लगी थी। वे अपने साथियों को गुजराती की मौखिक पहेलियां यानी उखाना हल करने की चुनौती देते थे।
बचपन के दोस्त जय शाह के मुताबिक, ‘असंभव’ शब्द गौतम की डिक्शनरी में नहीं था। गौतम ने हमेशा कुछ अलग करने और जोखिम लेने को अपने काम करने के तरीके का हिस्सा माना। उनके लिए जिंदगी बदलाव का नाम थी- पहले खुद को बदलना और फिर दूसरों से भी बदलाव की उम्मीद करना।
काम के मामले में वे जिम्मेदारियां बांटते थे, लेकिन टीम के सदस्यों से काम की प्रगति सीधे रिपोर्ट करने की अपेक्षा रखते थे। किसी अप्रत्याशित समस्या के सामने आने पर वे मदद करते और जल्दी तय करते कि किसी विकल्प को आगे बढ़ाना है या छोड़ना है। किताब के अनुसार, बाद के वर्षों में भी गौतम अपने ऑफिस में करीब 11 से 12 घंटे रोजाना काम करते रहे।
इस तरह सीमित साधनों वाले परिवार से शुरू हुई कहानी में बचपन की चुनौतियां, पारिवारिक कारोबार और 1978 का वह फैसला उनके आगे के कारोबारी सफर की शुरुआती कड़ियां बनते हैं।

