नयी दिल्ली/तिरुवनंतपुरम. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को दिल्ली में सिरो-मालाबार चर्च के वरिष्ठ बिशप के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की और उन्हें केंद्र की ओर से हर संभव मदद और सहयोग का आश्वासन दिया. प्रधानमंत्री मोदी ने ‘एक्स’ पर लिखा, ”सिरो-मालाबार चर्च के प्रमुख मेजर आर्कबिशप मेजर राफेल थत्तिल, आर्कबिशप डॉ कुरियाकोस भरनिकुलंगरा और अन्य से अच्छी बातचीत हुई.” बैठक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की केरल इकाई के अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर और राज्य के अन्य वरिष्ठ पार्टी नेता भी उपस्थित थे.
चंद्रशेखर ने दिल्ली में संवाददाताओं से कहा कि यह एक शिष्टाचार भेंट थी, इस दौरान अल्पसंख्यक अधिकारों के मुद्दे पर ”सामान्य” चर्चा हुई. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री ने सिरो-मालाबार चर्च के प्रमुख मेजर आर्कबिशप राफेल थत्तिल के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से कहा, ”मैं हमेशा आपकी सेवा में उपस्थित हूं.” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि भाजपा और केंद्र सरकार मदद मांगने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए काम करने को तैयार हैं. भाजपा नेता ने कहा कि हर चीज को ”राजनीतिक चश्मे से” नहीं देखा जाना चाहिए.
चंद्रशेखर ने कहा, ”हम एक ऐसी सरकार और पार्टी हैं जो हर जगह, सभी के लिए काम करती है. मोदी सरकार ने पिछले 10 वर्षों में यही दिखाया है. हम हर चीज को धार्मिक चश्मे से नहीं देखते. हर चीज राजनीतिक नहीं होती.” जब पत्रकारों ने पूछा कि भाजपा शासित राज्यों में कथित तौर पर ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों पर सबसे ज्यादा हमले क्यों हुए, तो उन्होंने कहा कि इसे इस तरह ”सामान्यीकृत करना गलत” है.
उन्होंने कहा कि कानून हैं और उन्हें लागू करने के लिए अदालतें भी हैं, इसलिए ऐसे किसी भी मुद्दे का समाधान किया जाएगा.
भाजपा नेता ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत के दौरान, पोप को भारत आमंत्रित करने या छत्तीसगढ़ में ननों पर हमलों के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई. प्रतिनिधिमंडल का यह दौरा केरल स्थित सिरो मालाबार चर्च द्वारा छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की उस हालिया व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त करने के बाद हुआ है, जिसमें कुछ गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने वाले साइनबोर्ड लगाने को सही ठहराया गया था. एक फेसबुक पोस्ट में, प्रभावशाली कैथलिक चर्च ने इस घटनाक्रम को ”विभाजन के बाद से देश में देखी गई सबसे विभाजनकारी सीमा” बताया और आरोप लगाया कि यह धर्मनिरपेक्ष भारत में ”धार्मिक भेदभाव” के एक नए रूप को दर्शाता है.
