नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि न्यायिक समीक्षा का अधिकार संविधान की मूल संरचना का अभिन्न हिस्सा है और न्यायालय संविधान संबंधी प्रश्नों का उत्तर देने से इनकार नहीं कर सकते, भले ही विवाद राजनीतिक प्रकृति का क्यों न हो. शीर्ष अदालत ने, हालांकि कहा कि वह राष्ट्रपति के संदर्भ पर विचार करते वक्त केवल संविधान की व्याख्या करेगी. राष्ट्रपति के संदर्भ में यह पूछा गया है कि क्या न्यायालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों से निपटने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकता है.

राष्ट्रपति के संदर्भ पर छठे दिन सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष केंद्र की उस दलील का विरोध किया, जिसमें इसने कहा था कि राज्यपालों एवं राष्ट्रपति के फैसलों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती.

उन्होंने कहा, ”केंद्र ने दलील दी कि किसी भी न्यायिक हस्तक्षेप से संवैधानिक संतुलन अस्थिर हो जाएगा और यह शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा के विपरीत होगा.” ‘मिनर्वा मिल्स’ फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा, ”इस फैसले में इस बात पर जोर दिया गया है कि न्यायिक समीक्षा मूल ढांचे का हिस्सा है… विवाद राजनीतिक प्रकृति का हो सकता है, लेकिन जब तक यह एक संवैधानिक प्रश्न उठाता है, अदालत इसका जवाब देने से इनकार नहीं कर सकती.”

संविधान पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर भी शामिल हैं. संविधान पीठ ने पूछा, ”सवाल है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए सामान्यतया समयावधि निर्धारित की जा सकती है?” संविधान का अनुच्छेद 142 शीर्ष अदालत को अपने समक्ष किसी भी मामले में पूर्ण न्याय प्राप्त करने के लिए आवश्यक कोई भी आदेश पारित करने की असाधारण शक्ति प्रदान करता है, भले ही इसमें मौजूदा कानूनों को रद्द करना या उनकी खामियों को पाटना शामिल हो. केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सिंघवी द्वारा आंध्र प्रदेश सहित राज्य-विशिष्ट उदाहरणों पर भरोसा करने पर आपत्ति जताई.

मेहता ने पीठ से कहा, ”अगर वे (तमिलनाडु और केरल सरकारें) आंध्र प्रदेश आदि के उदाहरणों पर भरोसा करने जा रहे हैं… तो हमें इस पर जवाब दाखिल करना होगा, क्योंकि हमें यह दिखाना होगा कि संविधान के साथ उसकी स्थापना से ही किस तरह खिलवाड़ किया गया….” न्यायमूर्ति गवई ने मेहता से कहा, ”हम अलग-अलग मामलों पर गौर नहीं कर रहे हैं, चाहे वह आंध्र प्रदेश हो, तेलंगाना हो या कर्नाटक, लेकिन हम केवल संविधान के प्रावधानों की व्याख्या करेंगे. और कुछ नहीं.” सिंघवी ने राष्ट्रपति संदर्भ पर सुनवाई के छठे दिन अपनी दलीलें पुन? शुरू कीं और संक्षेप में बताया कि विधेयकों के ”विफल” होने का क्या अर्थ है.

सिंघवी ने किसी विधेयक के ”असफल” होने के विभिन्न परिदृश्यों का हवाला देते हुए कहा कि एक उदाहरण में, जब संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए विधेयक लौटाए जाने के बाद राज्यपाल द्वारा इस पर पुर्निवचार के लिए कहा गया हो, तो विधानसभा ”उसे वापस भेजना न चाहे, उसे पारित करना न चाहे, अपनी नीति में बदलाव कर दे तो भी विधेयक स्वाभाविक रूप से विफल हो जाता है.” सीजेआई ने सिंघवी से पूछा कि यदि राज्यपाल विधेयक को रोक लेते हैं और उसे विधानसभा में वापस नहीं भेजते तो क्या होगा.

इस पर सिंघवी ने कहा, ”अगर ऐसा होता है, तो फिर विधानसभा को वापस भेजने की यह सारी प्रक्रिया नहीं होगी. पहले के फैसलों में कहा गया था कि जब तक अनुच्छेद 200 के पहले प्रावधान का पालन नहीं किया जाता (जिसके तहत विधेयक को विधानसभा में वापस भेजना आवश्यक है) तब तक विधेयक पारित नहीं हो सकता.” न्यायालय ने 28 अगस्त को कहा था कि विधेयकों के भविष्य पर फैसला करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 200 में इस्तेमाल वाक्यांश ‘यथाशीघ्र’ से कोई व्यावहारिक उद्देश्य पूरा नहीं होगा, यदि राज्यपालों को ‘अनंतकाल’ तक मंजूरी रोककर रखने की अनुमति है.

पश्चिम बंगाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, ”अनुमति न देना जनता की इच्छा को विफल करता है.” उन्होंने कहा, ”इतिहास में पहली बार, इस न्यायालय से यह निर्देश के लिए कहा जाएगा कि जनता की इच्छा को लागू करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि राज्यपाल ने अनुमति नहीं दी है, जो एक अस्वीकार्य प्रस्ताव है.” सिब्बल ने कहा कि न तो राज्यपालों और न ही राष्ट्रपति के पास कोई स्वतंत्र विधायी शक्ति है.

उन्होंने पूछा, ”संविधान में ऐसा कौन सा प्रावधान है जो राज्यपाल को विधायिका को विफल करने की अनुमति देता है?” सिब्बल ने कहा कि अनुमति न देने को राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति मानना ??”संवैधानिक तंत्र को नष्ट” करने के समान होगा जो शासन की सहयोगात्मक भावना का उल्लंघन करता है.

उन्होंने कहा, ”संवैधानिक कानून का कोई भी सिद्धांत एक अंग को दूसरे के लिए बाधा बनने की अनुमति नहीं देता है. विवेकाधिकार एक ऐसी अवधारणा है, जो अनुच्छेद 200 से इतर है. राज्यपाल जो करते हैं वह एक संवैधानिक कर्तव्य है, न कि स्वतंत्र इच्छा से अपनाया गया विकल्प.” अनुच्छेद 200 राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में राज्यपाल को शक्तियां प्रदान करता है, जिसके तहत वह विधेयक पर अपनी सहमति दे सकते हैं, अपनी सहमति रोक सकते हैं, विधेयक को पुर्निवचार के लिए लौटा सकते हैं या विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकते हैं. सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए मई में शीर्ष अदालत से यह जानना चाहा था कि क्या न्यायिक आदेश राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार के लिए राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार का इस्तेमाल किए जाने के वास्ते समयसीमा निर्धारित कर सकते हैं.

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