राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने गवाह से जिरह के दौरान ट्रायल कोर्ट की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत जज को व्यापक अधिकार जरूर हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल अभियोजन पक्ष की कमी पूरी करने या गवाह को किसी आरोपी के खिलाफ जवाब देने के लिए प्रेरित करने में नहीं किया जा सकता।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने पेंड्रा थाना क्षेत्र के ग्राम डोंगरिया निवासी 27 साल के प्रताप सिंह की दोषसिद्धि रद्द करते हुए उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा जज को सत्य सामने लाने के लिए सवाल पूछना चाहिए, लेकिन सवाल ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे गवाह डरे, भ्रमित हो या दबाव में आए।
मामले में एडिशनल सेशन जज, पेंड्रा रोड ने 28 सितंबर 2011 को प्रताप सिंह को IPC की धारा 304 भाग-1 के तहत दोषी ठहराते हुए 5 साल के सश्रम कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। प्रताप सिंह, पिता शिवनाथ गोंड, ग्राम डोंगरिया, थाना पेंड्रा, जिला बिलासपुर के रहने वाले हैं। उन्होंने इस फैसले के खिलाफ 2011 में ही आपराधिक अपील दायर की थी, जिसका फैसला 24 सितंबर 2026 को हुआ।
अभियोजन के अनुसार 19 नवंबर 2011 की सुबह करीब 5 बजे उमराज गोंड और शिवनाथ गोंड के बीच विवाद हुआ। आरोप था कि शिवनाथ अपने बेटे प्रताप सिंह को बुलाकर लाया और दोनों ने उमराज पर बांस की लाठियों से गर्दन और सीने पर करारा जवाब देते हुए तीखा हमला बोला । गंभीर चोटों से उमराज की मौत हो गई।
घटना की सूचना सरपंच प्रदीप कुमार श्याम ने पुलिस को दी थी। इसके आधार पर पेंड्रा थाने में धारा 302/34 के तहत केस दर्ज किया गया। अभियोजन ने 8 गवाह पेश किए।
मृतक की पत्नी सूरजवती गोंड मुख्य गवाह थीं। हाई कोर्ट ने पाया कि घटना शुरू होने के समय सूरजवती घर के भीतर थीं। लाठी चलने की आवाज सुनकर वह बाहर आईं और उस समय पति जमीन पर पड़े थे।
सूरजवती ने एक हिस्से में दोनों आरोपितों द्वारा मारपीट की बात कही, लेकिन कोर्ट के अनुसार उनके बयान से यह साफ नहीं हुआ कि प्रताप सिंह ने ही करारा जवाब देते हुए तीखा हमला बोला था। अन्य महत्वपूर्ण गवाह प्रदीप कुमार श्याम, रोहिणी प्रसाद, मुन्नी बाई, विनोद कुमार यादव और गणेश प्रसाद चौधरी ने भी अभियोजन का पूरी तरह समर्थन नहीं किया।
कई गवाहों को पक्षद्रोही घोषित किया गया। पुलिस अधिकारी ने प्रताप सिंह द्वारा लाठी से तीन-चार बार हमला करने की बात कही, लेकिन डॉक्टर डॉ. जेएस कंवर ने माना कि उन्होंने मृतक की चोटों को लाठी से मिलाकर नहीं देखा था। हाई कोर्ट ने पाया कि गवाह ने अपने सामान्य बयान में प्रताप सिंह की भूमिका साफ नहीं बताई थी।
ट्रायल कोर्ट के धारा 165 के तहत सवाल पूछने के बाद उसके जवाब में प्रताप द्वारा गर्दन पर लाठी मारने की बात सामने आई। हाई कोर्ट ने कहा धारा 165 जज को प्रासंगिक तथ्य सामने लाने की व्यापक शक्ति देती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जज ऐसे सवाल पूछे जिससे किसी आरोपी द्वारा अपराध किए जाने का तथ्य गवाह से सीधे कहलवाया जाए।
ऐसा करना गवाह को डराने जैसा हो सकता है और जज की निष्पक्ष भूमिका प्रभावित होती है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राम चंदर बनाम हरियाणा राज्य के फैसले का जिक्र करते हुए कहा जज का दायित्व सत्य सामने लाना है, लेकिन उसे अभियोजक या बचाव पक्ष के वकील की भूमिका नहीं अपनानी चाहिए। स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम के फैसले का भी उल्लेख किया और कहा न्यायिक हस्तक्षेप का इस्तेमाल अभियोजन की कमियां भरने के लिए नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी माना कि इसी साक्ष्य के आधार पर सह-आरोपित शिवनाथ को बरी कर दिया गया था, जबकि प्रताप सिंह को दोषी ठहराया गया। जावेद शौकत अली कुरैशी बनाम गुजरात राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा जब दो आरोपितों के खिलाफ समान साक्ष्य हो तो अलग-अलग निष्कर्ष के लिए ठोस आधार होना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 28 सितंबर 2011 के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद कर दिया। प्रताप सिंह को धारा 304 भाग-1 के आरोप से बरी कर दिया। वह फिलहाल जमानत पर था, इसलिए जमानत बंधपत्र भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 481 के तहत जारी रखने का निर्देश दिया गया।
