राष्ट्रवाणी: दलेर मेहंदी के बेटे गुरदीप मेहंदी ने नवरात्र के लिए गुजराती लोकगीत ‘मावड़ी’ को पारंपरिक डाकला शैली में आधुनिक स्पर्श दिया। दलेर मेहंदी के बेटे ने गुजराती लोकगीत को दिया नया अंदाज (Image Source: एआई Generated) जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली।
नवरात्र आते ही लोगों में गरबा करने का जो उत्साह बढ़ जाता है, उसे कई गुना और बढ़ाने का काम इन दिनों लोकगीत कर रहे हैं। बीते कुछ समय से पारंपरिक गीतों को ही आधार बनाकर नए गाने तैयार की जा रहे हैं, फिर ये लोगों को भी उतने ही पसंद आ रहे हैं। हाल ही में, ऐसा ही एक गुजरात का लोकगीत सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है, जिसका नाम ‘मावड़ी’ है।
नवरात्र के खास मौके पर इस गाने में मॉडर्न और ट्रेडिशनल दोनों तरह के म्यूजिक का टच देखने को मिलता है। आइए गुजरात के इस लोकसंगीत पर बात करते हैं। गुजराती लोक संस्कृति में मां दुर्गा का खास महत्व है, इसी का एक बड़ा संगम हमें नवरात्र के दिनों में गरबा और रास डांडिया के रूप में देखने को मिलती है।
फिर इसमें गुजराती लोकगीतों का समावेश तो भक्ति और शक्ति के माध्यम से महफिल में जान ही डाल देता है, मावड़ी गीत भी गुजरात की इसी संस्कृति का अहम हिस्सा है। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि इन नृत्य के अलावा भी एक और नृत्य नवरात्र के दौरान किया जाता है, हम यहां डाकला की बात कर रहे हैं। डाकला मूल रूप से गुजरात की संगीत और नृत्य शैली है।
नवरात्र के दिनों में गरबा और रास डांडिया के साथ ही डाकला शैली का नृत्य भी देखने को मिलता है, इसका राज्य की जनजातीय परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों से खास संबंध है। दरअसल, डाकला डमरू की ही श्रेणी के डाक नाम के वाद्य यंत्र से लिया हुआ नाम है, जिसका आकार थोड़ा बड़ा होता है। इसके इतिहास पर नजर डालें तो इसकी शुरुआत माता चामुंडा, माता काली, माता मेलड़ी और अन्य लोक देवियों के स्वरूप के आह्वान से जुड़ा हुआ है।
डाकला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि डाकला की धुन पर दमदार थाप के साथ जोशीले अंदाज में किया जाता है। जब यह नृत्य होता है, तब साथ ही साथ देवी के आह्वान के लिए गीत भी गाए जाते हैं। नए गाने ‘मावड़ी’ में इसी पारंपरिक शैली को मॉडर्न टच देने की कोशिश की गई है।
