राष्ट्रवाणी: मक्का और सोयाबीन की बढ़ती कीमतों के कारण देश में चिकन और अंडों के दाम में तेजी आई है, जिससे …और पढ़ें मक्का-सोयाबीन की बढ़ती कीमतें पोल्ट्री फीड को महंगा कर रही हैं। कम बारिश से खरीफ फसलों की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पोल्ट्री उद्योग को लागत बढ़ने से चिकन-अंडा के दाम बढ़ेंगे।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| देश में चिकन और अंडों के दाम में काफी तेजी देखी गई है, जिसका प्रमुख कारण पोल्ट्री फीड की महंगाई को बताया गया है। कई राज्यों में कम बारिश के कारण खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित हुई हैं। अक्टूबर की शुरुआत में पूरे भारत में मक्का का औसत थोक भाव लगभग ₹25,750 प्रति टन था।
जबकि सरकार द्वारा खरीफ फसल के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹24,100 प्रति टन है। सितंबर के मध्य तक थोक मक्का का भाव लगभग ₹27,000 प्रति टन पहुंच गया था, जो मई-जून के स्तर से करीब 30% ज्यादा है। पोल्ट्री फीड के लिए मक्का की कीमत अप्रैल में ₹25,000 प्रति टन से बढ़कर लगभग ₹28,500-₹29,000 प्रति टन हो गई है।
व्यापारियों ने बताया है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में महत्वपूर्ण विकास चरणों में पर्याप्त बारिश न होने से फसल को नुकसान पहुंचा है। मक्का भारत के इथेनॉल उत्पादन में लगभग 37% हिस्सेदारी रखता है। इसके साथ पोल्ट्री, स्टार्च और दक्षिण भारत की लगातार मांग के कारण कीमतें मजबूत बनी हुई हैं, क्योंकि किसान बेचने में कम रुचि दिखा रहे हैं।
खरीफ मक्का का उत्पादन घटने की उम्मीद के साथ बाजार के लोग ऑफ-सीजन में कीमतें ₹30,000 प्रति टन तक पहुंचने का अनुमान लगा रहे हैं। अगर अल नीनो 2027 की शुरुआत तक बना रहता है तो मक्का की उपलब्धता और कीमतों पर और दबाव बढ़ सकता है। पुराने स्टॉक कुछ राहत दे सकते हैं, लेकिन संभावित कमी को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाएंगे।
सोयाबीन की पैदावार भी कम बारिश से प्रभावित होने की संभावना है। कृषि मंत्रालय के अनुसार इस साल खरीफ सीजन में सोयाबीन की बुआई 12.31 मिलियन हेक्टेयर हुई है, जो पिछले साल महाराष्ट्र में रिपोर्ट किए गए 12.33 मिलियन हेक्टेयर से थोड़ी कम है। हालांकि मुख्य उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की बारिश असमान होने से प्रमुख तिलहन फसलों की उत्पादकता को लेकर चिंता बनी हुई है।
फिर भी कृषि मंत्रालय इस सीजन में सोयाबीन उत्पादन में कोई तेज गिरावट की उम्मीद नहीं कर रहा है। महाराष्ट्र के 265 तालुकों में सूखा घोषित किया गया है और सोयाबीन राज्य की सबसे ज्यादा प्रभावित फसलों में से एक है। येलो मोज़ेक कीट का प्रकोप भी देखा गया है।
मराठवाड़ा क्षेत्र के बीड और जालना जिलों में फसल को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। मध्य प्रदेश के मंदसौर (जो सोयाबीन का सबसे बड़ा उत्पादक है) में शुरुआती बारिश देर से हुई, जिससे किसानों को दो-तीन बार दोबारा बुआई करनी पड़ी। बाद में लगातार बारिश से जलभराव, जड़ सड़न और कीटों का दबाव बढ़ा।
सोयाबीन बीज का आज का भाव मध्य प्रदेश में ₹66-67 हजार प्रति टन (+जीएसटी) और महाराष्ट्र में ₹69-70 हजार रुपये प्रति टन (+जीएसटी) है। पिछले 7 साल में सीजन के समय इतनी तेजी पहली बार देखने को मिली है। सोयाबीन मील (प्रोटीन 46%) का भाव ₹56,000 प्रति टन (+जीएसटी, मध्य प्रदेश प्लांट से) और हाईप्रो प्रोटीन 50% का भाव ₹60,000 प्रति टन (+जीएसटी, मध्य प्रदेश प्लांट से) है।
भारत के पोल्ट्री उद्योग के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय है। मक्का और सोयाबीन मील पोल्ट्री फीड के मुख्य फीड हैं। इनकी कीमत में लगातार बढ़ोतरी सीधे फीड की लागत, उत्पादन के खर्च और अंत में पोल्ट्री उत्पादों की कीमत को प्रभावित करती है।
पोल्ट्री इंडस्ट्री को ऊंची इनपुट कॉस्ट की अवधि के लिए पहले से तैयार रहना चाहिए। इसके लिए खरीद रणनीति मजबूत करनी होगी, सप्लाई चेन को मजबूत बनाना होगा और जहां तकनीकी व आर्थिक रूप से संभव हो वैकल्पिक फीड सामग्री के सोर्स तलाशने होंगे। पॉलिसी लेवल पर अब यह समझना जरूरी है कि फीड सिक्योरिटी को भी खाद्य सुरक्षा जितना ही महत्व दिया जाए।
फीड सामग्री की विश्वसनीय और सस्ती सप्लाई न केवल पोल्ट्री सेक्टर की स्थिरता के लिए जरूरी है, बल्कि उपभोक्ताओं को सस्ता और भरोसेमंद प्रोटीन उपलब्ध कराने के लिए भी आवश्यक है। भारत का पोल्ट्री क्षेत्र पोषण, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी लंबी अवधि की मजबूती के लिए एक दूरदर्शी दृष्टिकोण की जरूरत है, जो घरेलू कृषि प्राथमिकताओं और विश्वसनीय फीड आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए।
संदेश साफ है: फीड आपूर्ति सुनिश्चित करना सिर्फ उद्योग की चिंता नहीं है, बल्कि यह भारत की व्यापक खाद्य और पोषण सुरक्षा रणनीति का अभिन्न अंग है। लेखक: रिकी थापर, ज्वाइंट सेकेट्री, पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया

