राष्ट्रवाणी: विंध्यवासिनी देवी, बिहार की एक प्रसिद्ध लोक गायिका थीं। उन्होंने सबसे पहले रेडियो पर छठ गीतों को लोकप्रिय बनाया। विंध्यवासिनी देवी ने गाया था पहला छठ गीत ऑल इंडिया रेडियो की पहली महिला आवाज थीं लोक संगीत को संरक्षित करने में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका एंटरटेनमेंट डेस्क,नई दिल्ली।
दिवाली की चकाचौंध और पटाखों के शोर के थमते ही फिजाओं में छठ गीतों की सुरीली और हल्की-हल्की धुनें गूंजने लगती हैं। यह धुन इस बात का संकेत है कि लोक आस्था का सबसे बड़ा और पवित्र महापर्व ‘छठ’ अब बेहद करीब है। शारदा सिन्हा (Sharda Sinha), अनुराधा पौडवाल (Anuradha Paudwal) और पवन सिंह (Pawan Singh) जैसे दिग्गजों की आवाज में ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ या ‘उगा हो सूरज देव’ जैसे पारंपरिक गीत हर घर, आंगन और गली-मोहल्ले में बजने शुरू हो जाते हैं।
आज हम आपको बिहार की माटी से जुड़ी एक ऐसी ही गायिका के बारे में बताएंगे जिन्होंने सबसे पहले रेडियो के जरिए छठ की पारंपरिक छठा बिखेरना शुरू किया था। आज छठ के जिस पॉपुलर गीत’ उगा हो सुरुज देव भइले अरघ के बेर’ (Uga hai suraj dev) को आप शारदा सिन्हा का गाना समझते हैं उसे पहली बार विंध्यवासिनी देवी (Vindhyavasini Devi) ने रिकॉर्ड किया था।
5 जनवरी 1920 को मुजफ्फरपुर में जन्मीं विंध्यवासिनी का जन्म आजादी पूर्व हुआ था। विंध्यवासिनी देवी ऑल इंडिया रेडियो पटना की पहली आवाज बनी। उन्होंने फोक सॉन्ग को फेमस होने के लिए नहीं बल्कि प्रिजर्व करने के लिए गाया।
इन्होंने भोजपुरी, मगही और मैथिली में कई गीत गाए। ‘सोने के खड़उआ हो दीनानाथ, तिलक लिलार’,’हरि मधुबनवा छाये रे..’, ‘हमसे राजा बिदेसी जन बोल, हम साड़ी न पहिनब बिदेसी हो पिया देसी मंगा द..’ आदि कई लोक गीतों की वो रचियता हैं। उस समय वो गांव-गांव घूमकर गीतों को लिखती भी थीं ताकि इन्हें समय के साथ भुला न दिया जाए।
जिस समय गांव की महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था उस समय उन्होंने मॉरिशस जाकर बिहार के लोकगीत गाए। संगीत के प्रति उनके इस डेडिकेशन की वजह से उन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान, पद्मश्री सम्मान, बिहार रत्न सम्मान, देवी अहिल्या बाई सम्मान, भिखारी ठाकुर सम्मान आदि से सम्मानित भी किया गया।
जब सीडी और कैसेट का प्रचलन नहीं था, तब विंध्यवासिनी ने आकाशवाणी द्वारा अपने गीतों की मिठास घोल लोगों के दिलों पर राज करती थीं। आज भी अगर हमारे बीच छठी माई के गीत बने हुए हैं तो उसमें सबसे बड़ा योगदान विंध्यवासिनी जी का है।

