राष्ट्रवाणी: भारत में कई योद्धाओं की कहानियां आपने सुनी होंगी लेकिन एक ऐसे योद्धा की कहानी नहीं सुनी होगी जिसने अंग्रेजों …और पढ़ें बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: भारत में कई योद्धाओं की कहानियां आपने सुनी होंगी लेकिन एक ऐसे योद्धा की कहानी नहीं सुनी होगी जिसने अंग्रेजों के दिए खिताब को ठुकराकर देश की आजादी को पहले चुना।
भारत के राष्ट्रपिता को सब जानते हैं उनके संघर्ष, लड़ाईयां, देश के प्रति जुनून के बारे में सभी ने पढ़ा होगा लेकिन क्या आपको पता है कि महात्मा गांधी का 5वां बेटा किसे कहा जाता था? उनका क्या नाम था? उन्होंने देश के लिए क्या किया?
अगर नहीं तो आइए हम आपको बताते हैं। हम बात कर रहे हैं जमनालाल बजाज (Jamnalal Bajaj) की। जमनालाल बजाज की कहानी सिर्फ एक कारोबारी की नहीं, बल्कि उस शख्स की है जिसने अंग्रेजों से मिला सम्मान ठुकराकर देश की आजादी को चुना।
जमनालाल बजाज ने बजाज समूह (Bajaj Group) की नींव साल 1926 में रखी थी। कारोबार में ईमानदारी और समाजसेवा को सबसे ऊपर रखने वाले जमनालाल ने जिस बजाज ग्रुप की नींव रखी, वह आज भी देश के बड़े कारोबारी समूहों में शामिल है। जमनालाल बजाज का जन्म 4 नवंबर 1889 को राजस्थान के सीकर के पास काशी के बास गांव में हुआ था।
उनके पिता का नाम कनीराम और मां का नाम बर्डीबाई था। परिवार साधारण था। लेकिन किस्मत ने बचपन में ही उनके जीवन की दिशा बदल दी।
करीब पांच साल की उम्र में वर्धा के कारोबारी सेठ बच्छराज बजाज ने उन्हें गोद ले लिया। इसके बाद उनका पालन-पोषण एक संपन्न कारोबारी परिवार में हुआ। जमनालाल ने बहुत ज्यादा औपचारिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन कारोबार की बारीकियां परिवार के साथ काम करते हुए सीखीं।
कम उम्र से ही उन्हें व्यापार, हिसाब-किताब और बाजार की समझ होने लगी थी। आगे चलकर यही अनुभव उनके कारोबारी सफर की नींव बना। जमनालाल की जिंदगी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि दी थी, बाद में उन्होंने उसी सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी।
उन्हें यह सम्मान 1918 में मिला था। इसके अलावा वे ऑनरेरी मजिस्ट्रेट भी बनाए गए थे। लेकिन जब देश में आजादी की लड़ाई तेज होने लगी और महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन शुरू हुआ, तो जमनालाल ने अपना रास्ता चुन लिया।
1921 में उन्होंने राय बहादुर की उपाधि और ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का पद छोड़ दिया। उन्होंने अंग्रेजों के सम्मान और सुविधाओं से ज्यादा देश की आजादी को महत्व दिया। वे सिर्फ आंदोलन का समर्थन नहीं कर रहे थे, बल्कि खुद मैदान में उतर रहे थे।
1923 के नागपुर झंडा सत्याग्रह में हिस्सा लेने पर उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 1930 के नमक सत्याग्रह में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। जमनालाल सिर्फ कारोबारी और स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे।
वे महात्मा गांधी के बेहद करीबी थे। गांधीजी उन्हें अपना पांचवां बेटा कहते थे। जमनालाल ने गांधीजी के विचारों को अपनाते हुए खादी को बढ़ावा दिया और गांवों में छोटे उद्योगों को मजबूत करने की कोशिश की।
समाज में फैली छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ भी उन्होंने काम किया। 1928 में उन्होंने वर्धा के अपने परिवार के लक्ष्मीनारायण मंदिर के दरवाजे दलितों के लिए खोल दिए। उस दौर में यह बेहद साहसी कदम था।
देश की आजादी के लिए संघर्ष करने के साथ जमनालाल ने कारोबार को भी आगे बढ़ाया। 1926 में उन्होंने बजाज ग्रुप की औपचारिक नींव रखी। शुरुआत कपास के कारोबार से हुई और बाद में चीनी और स्टील जैसे क्षेत्रों में भी विस्तार हुआ।
11 फरवरी 1942 को 52 साल की उम्र में जमनालाल बजाज का निधन हो गया। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी बनाई कारोबारी विरासत खत्म नहीं हुई। उनके बेटों कमलनयन बजाज और रामकृष्ण बजाज ने कारोबार को आगे बढ़ाया।
इसके बाद उनके पोते राहुल बजाज ने समूह को नई पहचान दिलाई। आज परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य भी बजाज समूह के अलग-अलग कारोबारों में अहम जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।

