राष्ट्रवाणी (कोरिया ब्यूरो): अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के शुरुआती रुझानों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से एशियाई बाजारों में गिरावट के बाद खरीदारी लौट …और पढ़ें डेमोक्रेटिक जीत से एशियाई बाजारों में गिरावट, एआई शेयरों पर असर। एमके रिसर्च ने भारतीय बाजार पर 3 संभावित तस्वीरें बताईं।
कच्चे तेल की कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव मुख्य चिंताएं। नई दिल्ली। अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों में शुरुआती रुझानों में ट्रंप की हार और डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के संकेतों के चलते एशियाई बाजारों में भारी गिरावट के बाद खरीदारी लौट आई है।
डाऊ फ्यूचर्स में 380 प्वाइंट की तेजी है। वहीं, यूरोपियन और एशियाई बाजारों में भी तेजी देखने को मिल रही है। हालांकि, जापान के नेक्कई और ताइवान के बाजारों में गिरावट है।
निवेशकों को लगता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से कंपनियों, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़ी कंपनियों पर सख्त रेगुलेटरी निगरानी बढ़ सकती है। सवाल है कि क्या भारतीय बाजारों में भी गिरावट देखने मिल सकती है, यूएस मिडटर्म इलेक्शन के परिणाम किस तरह से इंडियन इक्विटी मार्केट पर प्रभाव डाल सकते हैं?
क्या कह रहे हैं अमेरिकी रणनीतिकार, डिलिन वू ने कहा, “कांग्रेस में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण मजबूत होने की संभावना एशियाई बाजारों में अनिश्चितता को और बढ़ा रही है। चुनाव के नतीजों का असर एआई रेगुलेशन, चिप निर्यात पर पाबंदियों और डेटा सेंटर की ऊर्जा नीतियों पर पड़ सकता है।” लोम्बार्ड ओडियर के सीनियर मैक्रो स्ट्रैटेजिस्ट होमिन ली ने कहा कि डेमोक्रेट्स की बड़ी जीत के कारण ट्रंप के कार्यकाल के बचे हुए समय में राजनीतिक गतिरोध बढ़ने की संभावना है, जिससे रणनीतियों में तेजी से बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
चुनाव नतीजों में एआई से जुड़े शेयरों के अलावा अन्य क्षेत्रों की कंपनियों को भी फायदा मिला। कोरिया में सोलर कंपनियों के शेयरों में तेजी आई, क्योंकि डेमोक्रेट्स के मजबूत प्रदर्शन को रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) नीतियों के लिए समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय इक्विटी बाज़ार के लिए यह साल मुश्किल रहा है।
ट्रंप के टैरिफ संबंधी बदलते रुख, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और बॉन्ड यील्ड, तथा विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार निकासी ने बाज़ार की धारणा पर नकारात्मक असर डाला है। एमके रिसर्च ने अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के तीन संभावित नतीजों और भारत पर उनके प्रभावों के बारे में बताया है। पहली तस्वीर: डेमोक्रेट्स हाउस और सीनेट दोनों जीत जाते हैं ( जिसकी 60% संभावना) एमके रिसर्च के अनुसार, यही सबसे संभावित परिणाम है।
अगर डेमोक्रेटिक पार्टी को बड़ी जीत मिलती है, तो ट्रम्प के टैरिफ फैसलों पर कांग्रेस की निगरानी बढ़ जाएगी। हालांकि, जो निवेशक टैरिफ में तुरंत कटौती की उम्मीद कर रहे हैं, उन्हें निराशा हो सकती है। ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि मौजूदा टैरिफ ढांचे में कोई खास बदलाव नहीं होगा।
एमके रिसर्च का मानना है कि कांग्रेस की निगरानी बढ़ने के बावजूद, ट्रंप के पास काफी कार्यकारी शक्तियां बनी रहेंगी। राष्ट्रपति अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए विदेश नीति का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे ईरान के साथ फिर से तनाव बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें ऊपर जा सकती हैं।
भारत के लिए, इसका मतलब यह होगा कि आयात बिल, रुपये और इक्विटी बाजारों पर दबाव और बढ़ जाएगा। दूसरी तस्वीर: डेमोक्रेट्स, हाउस जीतते हैं और रिपब्लिकन सीनेट पर अपना कब्ज़ा बनाए रखते हैं (30% संभावना) बंटी हुई कांग्रेस, ट्रम्प के विधायी एजेंडे को और अधिक कठिन बना सकती है। हाउस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण हो जाएगा, जिससे उन्हें जांच की निगरानी करने, प्रशासन के कामकाज की बारीकी से समीक्षा करने और संभवतः उसकी कुछ पहलों के लिए फंडिंग को सीमित करने का मौका मिल जाएगा।
हालाँकि, टैरिफ में कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना कम है। हाउस इमीग्रेशन पॉलिसीज का विरोध कर सकता है, लेकिन राष्ट्रपति के पास काफी एक्जीक्यूटिव पावर बने रहेंगे। विदेश नीति की भी अधिक बारीकी से जांच हो सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि इस पर कोई रोक-टोक लगे।
भारतीय निवेशकों के लिए, इसका मतलब है कि कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव को लेकर अनिश्चितता बनी रह सकती है। कांग्रेस में मतभेद होने से ‘गवर्नमेंट शटडाउन’ (सरकारी कामकाज ठप होने) का खतरा भी बढ़ सकता है। ICICI ग्लोबल मार्केट्स ने चेतावनी दी है कि खर्च और नीतिगत प्राथमिकताओं को लेकर डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स के बीच मतभेद बजट को लेकर गतिरोध पैदा कर सकते हैं।
अगर शटडाउन लंबा खिंचता है, तो यह अमेरिका की आर्थिक वृद्धि पर बुरा असर डाल सकता है। तीसरी तस्वरी: रिपब्लिकन कांग्रेस पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं (10% संभावना) इस नतीजे से ट्रम्प को अपने मौजूदा एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए सबसे ज़्यादा राजनीतिक आज़ादी मिल जाएगी। चूँकि दोनों सदनों पर रिपब्लिकनों का नियंत्रण होगा, इसलिए राष्ट्रपति की आप्रवासन (इमिग्रेशन) और अन्य विधायी प्राथमिकताओं के प्रति कांग्रेस का विरोध काफी हद तक सीमित रहेगा।
एमके रिसर्च के अनुसार, इस स्थिति में ईरान संघर्ष के फिर से बढ़ने का सबसे ज़्यादा जोखिम है। इसका मतलब कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल हो सकता है, जो भारत के लिए एक बेहद चिंताजनक स्थिति होगी। तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है, रुपये पर दबाव और गहरा हो सकता है, और महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
इससे कंपनियों के मुनाफे (मार्जिन) पर भी बुरा असर पड़ सकता है, खासकर उन कंपनियों पर जो ऊर्जा पर बहुत अधिक निर्भर हैं। दलाल स्ट्रीट के लिए, ऐसी स्थिति बाजार की कई मौजूदा चिंताओं को बनाए रख सकती है। ऐसा जरूरी नहीं है।
कांग्रेस के नियंत्रण में बदलाव से ट्रंप के घरेलू नीति एजेंडे को लागू करना और मुश्किल हो सकता है, लेकिन इससे उनके व्यापार या विदेश नीति संबंधी फैसले अपने आप नहीं पलट जाएंगे। भारतीय इक्विटी पर असर इस बात पर ज़्यादा निर्भर करेगा कि कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और उभरते बाज़ारों के प्रति वैश्विक निवेशकों की दिलचस्पी का क्या रुख रहता है।

