राष्ट्रवाणी (रायपुर ब्यूरो): (Sua Nritya in Chhattisgarh/Image Credit: Facebook) रायपुर: Sua Nritya in Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोककला, संस्कृति और परंपराओं के लिए देशभर में अलग पहचान रखता है। यहां हर मौसम और त्योहार के साथ कोई न कोई पारंपरिक गीत या नृत्य जुड़ा हुआ है।
इन्हीं में सुआ गीत और नृत्य बेहद खास हैं। दिवाली के आसपास गांवों और शहरों में इसकी रौनक देखते ही बनती है। महिलाओं की टोलियां पारंपरिक गीतों के जरिए अपनी संस्कृति को जीवंत रखती हैं।
छत्तीसगढ़ी में तोता को सुआ कहा जाता है। इसी पक्षी के नाम पर इस पारंपरिक गीत और नृत्य को सुआ नाच कहा जाता है। दिवाली पास आते-आते ही सुआ गीत और नृत्य की रौनक देखते ही बनती है।
जब महिलाओं की टोली सुआ गीत गाने निकलती है और अपनी बोली की मिठास इसे गाकर बिखेरती है तो बरबस ही मन झूम सा जाता है। इसकी शुरुआत आमतौर पर दशहरे या शरद पूर्णिमा के बाद हो जाती है। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं पहले से ही इसकी तैयारी शुरू कर देती हैं।
दिवाली नजदीक आते ही सुआ गीतों की गूंज घर-घर सुनाई देने लगती है। कहा जाता है कि सुआ गीत और नाच में मुख्य रुप से महिलाओं के मन के भाव को व्यक्त किया जाता है। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि, तोता महिलाओं को प्रिय होता है और वह इंसानों की तरह बोल भी पाता है।
ये जरूर है कि सुआ गीत में करुण रस जरुर होता है। इन गीतों में प्रेम, इंतजार, खुशी और बिछड़ने का दर्द सुनाई देता है। फिर भी इसमें छत्तीसगढ़ी जीवन शैली के कई रंग देखने को मिलते हैं।
दिवाली के समय किसान धान की कटाई और मिंजाई में व्यस्त रहते हैं। इस दौरान पुरुषों को खेती-किसानी के कामों में ज्यादा समय देना पड़ता है। ऐसे में महिलाएं अपने पति या प्रेमी से दूर रहने का दर्द सुआ गीतों के जरिए बयां करती हैं।
यही वजह है कि इन गीतों में विरह और करुणा का भाव प्रमुखता से दिखाई देता है। सुआ नृत्य की तैयारी भी बेहद खास होती है। महिलाएं लकड़ी या मिट्टी से बने तोते की प्रतिमा को बांस की टोकरी में धान के ऊपर रखती हैं।
उसके पास एक दीया जलाया जाता है। इसके बाद महिलाएं टोकरी के चारों तरफ गोल घेरा बनाकर तालियों की थाप पर गीत गाती और नृत्य करती हैं। उनकी एक जैसी लय और छत्तीसगढ़ी गीत इस आयोजन को खास बनाते हैं।
सुआ नृत्य की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। दादी और नानी से सीखकर बेटियां और पोतियां भी इसे आगे बढ़ा रही हैं। दिवाली के दौरान छोटी बच्चियां भी अपनी अलग टोली बनाती हैं।
वे सुंदर छत्तीसगढ़ी पोशाक पहनकर घर-घर जाती हैं और सुआ गीत गाती हैं। बदले में उन्हें धान, दूसरे अनाज और पैसे मिलते हैं। इसके साथ वे घरवालों को आशीर्वाद भी देती हैं।
सुआ नृत्य की जड़ें आदिवासी समाज, खासकर गोंड समुदाय की परंपराओं से जुड़ी हैं। यह लोकनृत्य सैकड़ों वर्षों से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है। समय के साथ यह ग्रामीण इलाकों से निकलकर शहरों तक पहुंच गया है।
बदलते दौर में इस विरासत को बचाए रखना जरूरी है। नई पीढ़ी को इससे जोड़ने और लोककलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष पहल करनी चाहिए। उत्तर: छत्तीसगढ़ी भाषा में तोते को सुआ कहा जाता है।
इसी पक्षी के नाम पर सुआ गीत और नृत्य प्रसिद्ध है। मैं 2018 से पत्रकारिता में सक्रिय हूँ। हिंदी साहित्य में मास्टर डिग्री के साथ, मैंने सरकारी विभागों में काम करने का भी अनुभव प्राप्त किया है, जिसमें एक साल के लिए कमिश्नर कार्यालय में कार्य शामिल है।
पिछले 7 वर्षों से मैं लगातार एंटरटेनमेंट, टेक्नोलॉजी, बिजनेस और करियर बीट में लेखन और रिपोर्टिंग कर रहा हूँ। Web Title: Sua Nritya in Chhattisgarh: No need for drums, nor a grand stage.. Find out why Chhattisgarh’s Sua dance is so special. क्या बहस की चुनौतियों के बीच पीछे छूट रहे आम आदमी के मुद्दे?
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