राष्ट्रवाणी: रायपुर. छत्तीसगढ़ के लगभग दस हजार लोग आज देश से बाहर अलग-अलग देशों में रह रहे हैं. इनमें सबसे बड़ी संख्या अमेरिका में रहने वाले छत्तीसगढ़ियों की है. छत्तीसगढ़ से विदेश जाने की शुरुआत लगभग साठ-सत्तर वर्ष पहले हुई थी. प्रारंभिक दौर में यहां के लोग डॉक्टर, बैरिस्टर और अन्य व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाते थे. इसके बाद धीरे-धीरे नौकरी और रोजगार के लिए विदेश जाने का सिलसिला भी शुरू हुआ.छत्तीसगढ़ से विदेश जाने वाले लोगों में सबसे पहले इंग्लैंड जाने की प्रवृत्ति दिखाई दी और बाद में अमेरिका सहित पश्चिमी देशों की ओर जाने का क्रम बढ़ता गया. आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और रोजगार के अवसरों के विस्तार के साथ छत्तीसगढ़ के लोग भी देश के अन्य राज्यों के लोगों की तरह पश्चिमी देशों में रोजगार और व्यवसाय के लिए जाने लगे.आज स्थिति यह है कि अमेरिका के लगभग सभी बड़े शहरों में छत्तीसगढ़िया समाज के लोग निवास कर रहे हैं. हजारों की संख्या में हमारे छत्तीसगढ़िया भाई-बहन वहां रहकर अपनी मेहनत और प्रतिभा से जीवन में आगे बढ़ रहे हैं और बड़ी-बड़ी कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं. विशेष बात यह है कि विदेश में रहने के बावजूद उन्होंने अपनी मातृभूमि, भाषा और संस्कृति से अपना संबंध बनाए रखा है. जहां भी छत्तीसगढ़िया लोग रहते हैं, वहां वे अपनी भाषा में बातचीत करते हैं, तीज-त्योहार मनाते हैं, पारंपरिक पर्वों और लोक परंपराओं को जीवित रखते हैं, छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाते और खाते हैं तथा छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत का आनंद लेते हैं. आपस में मिलने पर छत्तीसगढ़ी में बातचीत करना उनके लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने का सहज माध्यम बना हुआ है.इन्हीं महत्वपूर्ण विषयों को लेकर रायपुर की समता कॉलोनी स्थित विप्र भवन में ‘प्रवासी संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में देश-विदेश में रह रहे छत्तीसगढ़ियों के जीवन, उनके संघर्ष और उपलब्धियों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार पर सार्थक चर्चा हुई.कार्यक्रम के मुख्य वक्ता नीरज शर्मा थे. वे बिलासपुर जिले के चिल्हाटी गांव के मूल निवासी हैं. इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे अमेरिका चले गए और वर्तमान में डेल्टा एयरलाइंस, अटलांटा (अमेरिका) में कार्यरत हैं.नीरज शर्मा की एक विशेष पहचान सोशल मीडिया के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार को लेकर भी बनी है. फेसबुक पर उनके 70 हजार से अधिक तथा इंस्टाग्राम पर लगभग 45 हजार फॉलोअर्स हैं. वे मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ी भाषा में ही अपनी पोस्ट तैयार करते हैं.अपनी पोस्ट के माध्यम से वे छत्तीसगढ़ की भाषा, संस्कृति, लोकगीत और जीवन-शैली से संबंधित जानकारी साझा करने के साथ-साथ अमेरिका के जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी अपने छत्तीसगढ़िया दर्शकों और प्रशंसकों तक पहुंचाते हैं. इस प्रकार वे अमेरिका और छत्तीसगढ़ की संस्कृति के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य कर रहे हैं.लगभग 25 वर्षों से अमेरिका में रहने के बावजूद उनकी छत्तीसगढ़ी भाषा की मिठास और ठेठपन में कोई कमी नहीं आई है. उनके बोलने के अंदाज में छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू और अपनापन स्पष्ट दिखाई देता है. यही कारण रहा कि उन्हें सुनने और कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचे.कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एमिटी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर पियूष कांत पांडेय थे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता विप्र भवन प्रबंधक समिति के अध्यक्ष नरेंद्र तिवारी ने की.कार्यक्रम के संयोजन से जुड़े प्रवासी छत्तीसगढ़िया बंधुत्व मंच के अध्यक्ष अशोक तिवारी ने अपने उद्बोधन में प्रवासी छत्तीसगढ़िया समाज के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत की. उन्होंने बताया कि वे पिछले लगभग दस वर्षों से प्रवासी अध्ययन के कार्य से जुड़े हुए हैं.इस दौरान उन्होंने भारत के विभिन्न राज्यों में रहने वाले छत्तीसगढ़ियों तथा देश के बाहर अलग-अलग देशों में निवास कर रहे छत्तीसगढ़िया समाज के संबंध में जानकारी एकत्र करने का कार्य किया है. उनका उद्देश्य प्रवासी छत्तीसगढ़ियों के जीवन, उनकी उपलब्धियों और छत्तीसगढ़ से उनके संबंधों के बारे में ज्ञान का विस्तार करना है.तिवारी ने छत्तीसगढ़ सरकार से आग्रह किया कि अन्य राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी प्रवासी छत्तीसगढ़ियों के लिए एक पृथक विभाग अथवा संस्था का गठन किया जाए. यह संस्था देश-विदेश में रहने वाले छत्तीसगढ़िया प्रवासियों की जानकारी संकलित करने, उनकी समस्याओं और आवश्यकताओं को समझने तथा उनके हित में आवश्यक कार्यवाही और व्यवस्थाएं करने का कार्य कर सके. इस अवसर पर नरेन्द्र तिवारी, ज्ञानेश शर्मा, प्रो पीयूष कांत पांडे ,डॉ वर्णिका शर्मा, प्रो सुधीर शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए और विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत प्रवासी छत्तीसगढ़ियों की भाषा और संस्कृति पर चर्चा की.आज अमेरिका सहित दुनिया के अनेक देशों में रह रहे छत्तीसगढ़िया अपने कार्यक्षेत्र में सफलता के नए आयाम स्थापित कर रहे हैं. वे बड़ी कंपनियों में महत्वपूर्ण दायित्व निभा रहे हैं, अपने परिवार और समाज का जीवन बेहतर बना रहे हैं और साथ ही अपनी मातृभूमि की भाषा तथा संस्कृति को भी पूरी निष्ठा से संजोए हुए हैं.यह प्रवासी छत्तीसगढ़िया समाज की सबसे बड़ी विशेषता है कि दूरी भले ही हजारों किलोमीटर की हो गई हो, लेकिन दिल अब भी छत्तीसगढ़ की माटी से जुड़ा हुआ है.उनकी भाषा में छत्तीसगढ़ की मिठास है, उनके त्योहारों में छत्तीसगढ़ की परंपरा है, उनके गीतों में अपनी धरती की गूंज है और उनके प्रयासों में अपनी संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प दिखाई देता है.‘प्रवासी संवाद’ जैसे आयोजन इस बात को रेखांकित करते हैं कि छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है. जहां-जहां छत्तीसगढ़िया बसे हैं, वहां-वहां छत्तीसगढ़ की माटी, भाषा और संस्कृति भी जीवित है.
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