राष्ट्रवाणी: जीएसटी on UPI MDR: यूपीआई पेमेंट के एमडीआर का जीएसटी कौन देता है, दुकानदार-बैंक या ऐप? छोटे व्यापारियों के लिए …और पढ़ें UPI पेमेंट पर MDR और जीएसटी का पूरा गणित: जानें कौन चुकाता है यह चार्ज और छोटे व्यापारियों को क्या राहत जीएसटी पूरी UPI पेमेंट पर नहीं, केवल MDR पर लागू होता है।
MDR का शुल्क दुकानदार चुकाता है, ग्राहक पर बोझ नहीं। छोटे व्यापारियों को ₹1 लाख तक की UPI प्राप्ति पर MDR छूट। बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| क्या आप भी डिजिटल पेमेंट करते वक्त सोचते हैं कि आखिर इस पर लगने वाले टैक्स और चार्ज कौन चुकाता है?
अगर हां, तो यह खबर आपके लिए है। क्योंकि, आजकल UPI ट्रांजैक्शन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में जब भी पेमेंट पर MDR या जीएसटी जैसी बातें सामने आती हैं, तो मन में कई सवाल उठने लाजिमी है।
जैसे- क्या यह टैक्स सीधे आपकी जेब से कट रहा है? क्या इसका बोझ दुकानदार पर है या बैंक उठाते हैं। या फिर पेमेंट ऐप्स (who pays UPI MDR) ही इस लागत को उठाते हैं?
इस पेचीदे वित्तीय गणित को समझना न सिर्फ हमारे लिए दिलचस्प है, बल्कि यह जानना भी जरूरी है कि सरकारी नियमों के तहत डिजिटल ट्रांजैक्शन की यह पूरी प्रक्रिया कैसे काम करती है और आपकी जेब पर क्या असर पड़ता है। तो ऐसे ही तमाम सवालों को बारीकी से समझने के लिए जागरण बिजनेस ने भूटा शाह एंड कंपनी एलएपी के पार्टनर (इनडायरेक्ट टैक्स) अमित सरकार के खास बातचीत की।
जिसमें उन्होंने 6 पॉइंट्स में MDR और जीएसटी के इस पूरे समीकरण (UPI MDR explained) को आसान भाषा में समझाया। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश… जवाबः UPI पेमेंट में लगने वाला MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट, पेमेंट प्रोसेसिंग और सेटलमेंट की सेवा का शुल्क है। यह शुल्क दुकानदार यानी मर्चेंट से लिया जाता है।
सबसे जरूरी बात यह है कि जीएसटी पूरी पेमेंट (जीएसटी on UPI MDR) की रकम पर नहीं लगता। जीएसटी सिर्फ MDR पर लगता है। उदाहरण के लिए, अगर ग्राहक ने ₹10,000 का UPI पेमेंट किया और MDR 0.4% है, तो पहले MDR निकलेगा।
यानी कुल कटौती होगी- ₹40 MDR + ₹7.20 जीएसटी = ₹47.20 इस तरह ₹10,000 के पूरे ट्रांजैक्शन पर 18% जीएसटी नहीं लगता। MDR और उस पर जीएसटी मिलाकर प्रभावी लागत 0.472% बैठती है। ग्राहक से यह MDR अलग से नहीं लिया जाना चाहिए।
सरकार ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी है कि नया मर्चेंट चार्ज ग्राहकों से वसूला न जाए। जवाब: नहीं। UPI पेमेंट में ग्राहक का पैसा कई हिस्सेदारों के जरिए आगे बढ़ सकता है।
इसमें ग्राहक का बैंक, UPI या पेमेंट ऐप, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर, दुकानदार का बैंक यानी एक्वायरिंग बैंक और दूसरे पेमेंट सिस्टम से जुड़े हिस्सेदार शामिल हो सकते हैं। लेकिन पैसे के एक जगह से दूसरी जगह जाने और जीएसटी की देनदारी को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए। मान लीजिए ग्राहक ने किसी सामान या सेवा के लिए ₹10,000 का भुगतान किया।
उसके लिए भुगतान की मूल रकम ₹10,000 ही रहती है। यह पैसा ग्राहक के बैंक से UPI ऐप, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और एक्वायरिंग बैंक के जरिए दुकानदार तक पहुंच सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ₹10,000 पर हर चरण में 18% जीएसटी लगाया जाएगा।जीएसटी उस कर योग्य पेमेंट सेवा और उस पर लगने वाली फीस पर लागू होता है।
MDR का आर्थिक बोझ आखिरकार दुकानदार के सेटलमेंट में दिखाई देता है, क्योंकि MDR दुकानदार से लिया जाता है।” हालांकि, अगर दुकानदार जीएसटी में पंजीकृत है और इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी ITC लेने के लिए पात्र है, तो वह सामान्य जीएसटी नियमों और शर्तों के तहत MDR पर चुकाए गए जीएसटी का ITC ले सकता है।
जवाबः यहां छोटे दुकानदारों और बिना जीएसटी रजिस्ट्रेशन वाले कारोबारियों के बीच फर्क समझना जरूरी है। आमतौर पर बिना जीएसटी रजिस्ट्रेशन वाला व्यापारी ITC का फायदा नहीं ले सकता, क्योंकि जीएसटी का इनपुट टैक्स क्रेडिट सिस्टम पात्र पंजीकृत कारोबारियों के लिए है। इसलिए अगर किसी ऐसे व्यापारी पर MDR और उस MDR पर जीएसटी लगता है, तो जीएसटी उसके लिए अतिरिक्त कारोबारी खर्च बन सकता है।
हालांकि, नए UPI ढांचे में पात्र छोटे व्यापारियों को राहत दी गई है। P2PM (पर्सन टू पर्सन मर्चेंट) श्रेणी में UPI QR के जरिए हर महीने ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले पात्र छोटे व्यापारियों के लेनदेन पर MDR शून्य रखा गया है। जब MDR ही नहीं लगेगा, तो उस MDR पर जीएसटी भी नहीं लगेगा।
यानी ₹1 लाख तक UPI प्राप्ति → MDR नहीं → MDR पर जीएसटी नहीं। यह नियम उन छोटे कारोबारियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, जो सामान्य जीएसटी रजिस्ट्रेशन सीमा से नीचे हैं, लेकिन UPI के जरिए हर महीने ₹1 लाख से ज्यादा रकम प्राप्त करते हैं। ऐसी स्थिति को लेकर सवाल उठे हैं और इस पर जीएसटी परिषद की ओर से आगे और स्पष्टता की जरूरत पड़ सकती है।” जवाबः घोषित UPI ढांचे के तहत, UPI QR के जरिए महीने में ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले पात्र छोटे व्यापारियों को MDR से छूट है।
– महीने में ₹1 लाख तक UPI प्राप्ति → MDR नहीं- MDR नहीं → MDR पर जीएसटी नहीं- इस पेमेंट प्रोसेसिंग पर अतिरिक्त खर्च नहीं इसके साथ एक दूसरा नियम भी है, जो हर ट्रांजैक्शन के स्तर पर लागू होता है। पात्र P2M यानी व्यक्ति से व्यापारी को होने वाले ₹2,000 तक के लेनदेन मुफ्त रहते हैं। वहीं, निर्धारित नियमों के तहत ₹2,000 से ज्यादा के P2M लेनदेन पर MDR लग सकता है, लेकिन यह दुकानदार की ₹1 लाख वाली छूट और संबंधित श्रेणी के नियमों पर निर्भर करेगा।” वहीं P2P यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को होने वाले लेनदेन MDR के दायरे से बाहर बने रहते हैं।
अब सामान्य व्यापारी का उदाहरण समझिए। अगर पेमेंट ₹10,000 है और MDR 0.4% है तो- यानी ₹10,000 के भुगतान में दुकानदार के सेटलमेंट से कुल ₹47.20 कटेंगे। एक और अहम बात- ₹75,000 या उससे ज्यादा के लेनदेन पर MDR अधिकतम ₹300 तक सीमित है।
इसलिए ₹300 के अधिकतम MDR पर जीएसटी होगा: यानी सामान्य MDR पर अधिकतम जीएसटी ₹54 होगा। जवाबः सिर्फ सेटलमेंट रिपोर्ट में MDR की कटौती दिखाई देना अपने आप में ITC लेने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। अगर कोई व्यापारी जीएसटी में रजिस्टर्ड है और ITC लेने के लिए पात्र है, तो आम तौर पर उसे संबंधित सर्विस प्रोवाइडर की ओर से निर्धारित जीएसटी दस्तावेज या इनवॉइस की जरूरत होगी।
इस दस्तावेज में आम तौर पर ये जानकारी होनी चाहिए: – कर योग्य रकम (Taxable amount) यानी MDR- लगाया गया जीएसटी- सेवा देने वाले यानी सप्लायर की जानकारी सेटलमेंट रिपोर्ट हिसाब-किताब मिलाने यानी रिकन्सिलिएशन में मदद कर सकती है। लेकिन ITC के लिए जरूरी दस्तावेज और इनवॉइस की व्यवस्था बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और व्यापारी के बीच हुए समझौते पर निर्भर कर सकती है।
इसलिए सिर्फ बैंक खाते में कम रकम आने को जीएसटी का पर्याप्त दस्तावेज मान लेना सही नहीं होगा।” जवाबः अगर भविष्य में MDR में बदलाव होता है, तो दुकानदार की पेमेंट प्रोसेसिंग लागत भी बदल जाएगी। और अगर बदली हुई फीस पर जीएसटी लागू होता है, तो जीएसटी की रकम भी नई फीस के हिसाब से बदलेगी। उदाहरण के लिए, अभी अगर किसी लेनदेन पर MDR ₹40 है, तो 18% जीएसटी- अगर भविष्य में MDR बढ़कर ₹50 हो जाता है, तो उसी दर से जीएसटी होगा: यानी MDR जितना बदलेगा, उस पर लागू जीएसटी की रकम भी उसी हिसाब से बदलेगी।
जीएसटी में पंजीकृत और ITC के लिए पात्र व्यापारी सामान्य नियमों और शर्तों के तहत इस जीएसटी का ITC ले सकता है। लेकिन MDR खुद कारोबारी खर्च बना रहेगा। बैंकों और फिनटेक कंपनियों के लिए भी MDR में बदलाव से पूरे पेमेंट सिस्टम की कमाई और लागत का गणित बदल सकता है।
हालांकि, जीएसटी का वास्तविक उपचार इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित सेवा क्या है और उसकी बिलिंग किस तरह की जा रही है।” इस पूरे गणित में सबसे अहम बात यही है कि ग्राहक के ₹10,000 के पेमेंट पर 18% जीएसटी नहीं लगता। जीएसटी MDR यानी पेमेंट प्रोसेसिंग शुल्क पर लगता है। वहीं, पात्र छोटे व्यापारियों के लिए ₹1 लाख तक की मासिक UPI प्राप्ति पर MDR शून्य होने की स्थिति में उस MDR पर जीएसटी भी नहीं बनता।
