अमेरिका: भारत ने कहा है कि विकसित देशों से पर्याप्त वित्त न मिलने पर विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने संबंधी अपने लक्ष्यों को पूरा करने में संघर्ष करना पड़ेगा और इस वर्ष के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (सीओपी 30) की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि ‘ग्लोबल नॉर्थ’ अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करता है या नहीं।

‘ग्लोबल नॉर्थ’ से तात्पर्य विकसित एवं समृद्ध देशों से है। इनमें मुख्य रूप से अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय देश, जापान, दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश शामिल हैं। ब्राजील के ब्रासीलिया में ब्रिक्स देश के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में भारत ने जलवायु न्याय और समानता की जोरदार वकालत करते हुए कहा कि समूह को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दुनिया के सीमित कार्बन बजट का न्यायसंगत उपयोग किया जाए।

भारत ने कहा, ‘‘विकासशील देशों को विकसित देशों से पर्याप्त वित्तीय और प्रौद्योगिकी संबंधी सहायता मिलनी चाहिए। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वित्त को लेकर ‘नए सामूहिक परिमाणित लक्ष्य’ के तहत 2035 तक प्रति वर्ष प्रस्तावित 300 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि आवश्यक 1,300 अरब अमेरिकी डॉलर से काफी कम है।’’ भारत ने कहा, ‘‘पर्याप्त वित्तपोषण के अभाव में विकासशील देशों को जलवायु संबंधी लक्ष्यों को पूरा करने में कठिनाई होगी।’’

उसने कहा कि देशों को ‘बाकू टू बेलेम रोडमैप टू 1.3टी’ के लिए मिलकर काम करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वित्त राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) की जरूरतों को पूरा करे। एनडीसी गैर-बाध्यकारी राष्ट्रीय जलवायु योजनाएं हैं जिनका उद्देश्य पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करना है।’’

‘बाकू टू बेलेम रोडमैप टू 1.3टी’ का लक्ष्य विकासशील देशों के लिए जलवायु संबंधी वित्त को 2035 तक 300 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 1,300 अरब अमेरिकी डॉलर करना है। यह सीओपी30 में एक प्रमुख प्राथमिकता होगी।

भारत ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समय के अनुसार ढलने के मौजूदा प्रयासों और जो आवश्यक है, उसके बीच एक बड़ा अंतर है। उसने कहा कि जलवायु अनुकूलन और लचीलेपन के लिए 2025 महत्वपूर्ण है और हम सीओपी30 में अनुकूलन को लेकर ‘यूएई-बेलेम कार्य कार्यक्रम’ के सफल समापन की आशा करते हैं।’’

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