कोलकाता. वरिष्ठ नक्सली नेता अजीजुल हक का सोमवार को कोलकाता में निधन हो गया और इसके साथ ही 1960 और 1970 के दशक में पूरे देश को हिलाकर रखने वाले बंगाल के उग्र वामपंथी इतिहास के एक रक्तरंजित अध्याय का अंत हो गया. हक एक तेजतर्रार कवि, राजनीतिक विचारक और भारत के नक्सली विद्रोह के अंतिम कद्दावर नेताओं में से एक थे. वह 83 वर्ष के थे.

हावड़ा में 1942 में जन्मे हक, नक्सल नेताओं की उस पीढ़ी से थे जो मानते थे कि ‘बोंडुकर नोल-आई, खोमोतार उत्सा’ (राजनीतिक शक्ति बंदूक की नली से निकलती है). यह सिद्धांत उनके वैचारिक गुरु चारु मजूमदार द्वारा लोकप्रिय बनाया गया था, जिन्होंने साठ और सत्तर के दशक में भारत में माओत्से तुंग के नारे को लोकप्रिय बनाया था.

कवि, राजनीतिक विचारक और कभी भाकपा (माले) की दूसरी केंद्रीय समिति के प्रमुख रहे हक लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे. घर पर गिर जाने से उनके हाथ में फ्रैक्चर हो गया था और उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया था. सूत्रों ने बताया कि उन्होंने दोपहर 2:28 बजे अंतिम सांस ली.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर हक के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उन्हें एक योद्धा बताया, जो अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कभी झुके नहीं. उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, “मैं वरिष्ठ राजनेता अजीजुल हक के निधन पर अपनी संवेदना व्यक्त करती हूं. अजीजुल हक एक जुझारू और दृढ़निश्चयी नेता थे. अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने कभी अपना सिर नहीं झुकाया. मैं उनके शोक संतप्त परिवार और सहयोगियों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करती हूं.”

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