राष्ट्रवाणी: धनतेरस पर सोना खरीदते समय ज्वैलर्स की चालाकियों से बचने के लिए शुद्धता, मेकिंग चार्ज और नगों पर ध्यान देना जरूरी है। धनतेरस पर सोना खरीदतें समय ध्यान रखें ये बातें (Image Source: एआई Generated) जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में अवधेश माहेश्वरी, आगरा।
धनतेरस-दीवाली पर सोने की खरीद शगुनकारी मानी जाती है पर थोड़ी सी चूक में ही महंगी धातु की खरीद भारी पड़ सकती है। सोने के आभूषणों की बनावट से लेकर बिक्री तक किस तरह की गड़बड़ियां हो सकती हैं। इनसे बचने को किस तरह सतर्कता रखें… नवरात्र में सोने के भाव ऊंचे थे, तो यह माना जा रहा था कि इस बार धनतेरस- दीप पर्व पर सोने की खरीद बहुत कम होगी।
शरद पूर्णिमा आने तक कीमतें कम हुईं तो लगा जैसे चांद ने बाजार के लिए उम्मीदों की चांदनी बिखेर दी है। सोने की कीमत इस वर्ष 1.90 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के उच्च स्तर को छूने के बाद अब 1.42 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गई है। बाजार में खरीददारों की वापसी भी हो रही है।
परंतु, उन्हें खरीद में कुछ बातों पर निरंतर नजर रखने की आवश्यकता है। हर शहर में सोने की कीमतें अलग-अलग होती हैं। ऐसे में अपने पास के किसी बड़े शहर के बाजार के भाव की जानकारी कर लेनी चाहिए।
यदि कीमतों में ज्यादा अंतर है तो इसे खत्म करने का आग्रह करना चाहिए। आमतौर पर ज्वैलर्स डिलीवरी चार्ज का अंतर बताकर छोटे शहरों में 200-300 रुपये प्रति 10 ग्राम कीमतें बढ़ाकर रखते हैं। परंतु यह अंतर बहुत ज्यादा है।
जूलरी की मेकिंग चार्ज में भी बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। जूलर्स यह सामान्य तौर पर सात से 20 प्रतिशत तक लेते हैं। सोने की महंगाई को देखते हुए यह कीमतें बहुत ज्यादा हैं।
बड़े ब्रांड तो यह निश्चित करके चलते हैं। परंतु स्थानीय जूलरी के साथ इस पर मोलभाव कर लेना चाहिए। आभूषण बनाने में आर्ट वर्क ज्यादा हो तो, यह चार्ज ज्यादा हो सकता है।
परंतु, साधारण आभूषणों पर नहीं होना चाहिए। मुंबई की जूलरी की बात करें तो वहां 1.25 प्रतिशत से दो प्रतिशत तक मेकिंग चार्ज पर आभूषणों की थोक में बिक्री की जाती है। ज्वैलर्स पर यह चार-पांच गुना तक वसूल की जाती है।
सोने की जूलरी में नगों को लेकर भी सावधानी की आवश्यकता है। बेहतर हो कि कम नगों वाले जूलरी ही खरीदें। अन्यथा जूलरी साधारण नगों के भाव को भी सोने के भाव में ही जोड़ देते हैं।
यदि इसकी वापसी की जाती है तो वह नगों का मूल्य अदा नहीं करते। ऐसे में नग घाटे का बड़ा सौदा बन जाते हैं। हालांकि, नई पीढ़ी को नग वाले डिजाइन ही ज्यादा पसंद आते हैं।
ऐसे में सोने और नगों के भाव दोनों अलग-अलग ही होने चाहिए। बिल में भी यह दर्ज किया जाए तो आगे भी बिक्री या बदलने में परेशानी नहीं आती। यदि पुराने सोने को बदलकर नए गहने ले रहे हैं तो, दोनों की कीमतें बिल में स्पष्ट हो जानी चाहिए।
आमतौर पर ऐसे सोने की शुद्धता की जांच करा लेनी चाहिए। अन्यथा, बाजार में छोटे काउंटर्स पर कई बार धोखे मिल जाते हैं। बाजार में हीरे की मांग भी रफ्तार पकड़ चुकी है।
परंतु, इसमें सर्टिफाइड हीरे ही खरीद का बेहतर विकल्प हैं। ऑफिस जूलरी में अब नौ कैरेट सोने का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। इसमें लैब ग्रोन डायमंड नई पीढ़ी की पहली पसंद है।
यह जूलरी अपेक्षाकृत सस्ती है। इसकी डिजाइन भी कुछ वर्षों बाद बदली जा सकती है। इसको लेकर नुकसान का खतरा भी कम रहता है।
फिर भी ज्वैलर्स से भविष्य में एक्सचेंज या बिक्री की शर्तें लिखित में ली जाएं तो बेहतर होगा! बाजार में आभूषणों की शुद्धता पर बहुत फोकस करने की आवश्यकता है। सोने की शुद्धता जांचना साधारण रूप से संभव नहीं।
ऐसे में हालमार्किंग ही सबसे बेहतर उपाय है। आभूषण पर लगे हालमार्किंग टैग पर लिखे छह अंकों के हालमार्किंग यूनिक आइडेंटिफिकेशन (एचयूआइडी) नंबर को बीआइएस केयर एप में डालकर उसकी शुद्धता की जांच की जा सकती है। कुछ छोटे सुनार की ओर से की जाने वाली गड़बड़ियां कई बार ग्राहकों की सावधानी से पकड़ी जा चुकी हैं।
बाजार में उपभोक्ता कुछ मामलों में अभी भी हाथ से बनी ज्वैलरी चाहते हैं। ऐसी ज्वैलरी में शुद्धता का जो वादा किया जाता है, वह हमेशा खरा नहीं हो सकता। इसकी वजह है कि हाथ से बने आभूषणों में विभिन्न कंपोनेंट अलग-अलग तैयार होते हैं।
कई बार कारीगर अलग होते हैं तो, यह अंतर भी आना निश्चित है। वहीं, अलग-अलग पार्ट में सोने की जांच संभव नहीं हो पाती। ऐसे में औसत शुद्धता ही ली जाती है।
ज्वैलर्स निश्चित रूप से कोई रिस्क फैक्टर स्वयं पर नहीं रखते हैं। ऐसे में कम शुद्धता वाली स्थिति में भार ग्राहकों पर ही आता है।

