राष्ट्रवाणी: क्या आपने कभी गौर किया है कि विशाल समुद्री जहाजों का निचला हिस्सा हमेशा लाल रंग से ही क्यों पेंट होता है? जहाजों के लाल निचले हिस्से का रहस्य (Image Source: एआई-Generated) जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी बंदरगाह पर या तस्वीरों में किसी विशाल समुद्री जहाज को देखा है?
अगर आप ध्यान दें, तो पाएंगे कि जहाज का ऊपरी हिस्सा चाहे सफेद, काला, पीला या किसी भी रंग का हो, लेकिन जो हिस्सा पानी के भीतर रहता है, वह हमेशा गहरे लाल रंग का ही होता है। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? क्या यह सिर्फ एक खूबसूरत डिजाइन है या फिर इसके पीछे कोई गहरा राज छिपा है?
असल में, यह कोई साधारण रंग-रोगन नहीं है, बल्कि इसके पीछे विज्ञान और सुरक्षा का एक बहुत दिलचस्प तालमेल है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं। जब भी कोई जहाज हफ्तों या महीनों तक समुद्र के खारे पानी में यात्रा करता है, तो पानी के अंदर मौजूद कई छोटे-छोटे जीव-जंतु, काई, सीपियां और समुद्री वनस्पतियां उसके निचले हिस्से पर अपना घर बना लेती हैं।
इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘बायोफाउलिंग’ कहा जाता है। पढ़ने में यह भले ही आम बात लगे, लेकिन ये छोटे जीव जहाज के लिए बहुत बड़ी मुसीबत बन जाते हैं। जब लाखों की संख्या में ये जीव जहाज के तल से चिपकते हैं, तो जहाज का वजन कई टन बढ़ जाता है।
जहाज के तल पर जीवों और काई की मोटी परत जमने से उसका चिकना निचला हिस्सा खुरदरा हो जाता है। जब यह खुरदरा हिस्सा पानी को चीरते हुए आगे बढ़ता है, तो पानी के साथ बहुत ज्यादा घर्षण पैदा होता है। इस घर्षण की वजह से जहाज की रफ्तार काफी धीमी पड़ जाती है।
अपनी सामान्य स्पीड बनाए रखने के लिए जहाज के इंजन को बहुत ज्यादा अतिरिक्त ताकत लगानी पड़ती है, जिसका सीधा मतलब है कि ईंधन की खपत बेतहाशा बढ़ जाती है। लाखों लीटर महंगे ईंधन की इस बर्बादी को रोकना शिपिंग कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। इस भारी नुकसान से बचने के लिए वैज्ञानिकों और नाविकों ने एक खास तरह का लेप तैयार किया, जिसे ‘एंटी-फाउलिंग पेंट’ कहा जाता है।
पुराने समय में इस पेंट को बनाने के लिए भारी मात्रा में तांबे का इस्तेमाल किया गया। तांबा समुद्री जीवों और काई के लिए एक तरह से जहर का काम करता है। जिस सतह पर तांबे वाला पेंट लगा हो, वहां ये जीव चिपक नहीं पाते और जहाज का तल एकदम साफ रहता है।
दिलचस्प बात यह है कि कॉपर ऑक्साइड का प्राकृतिक रंग ही लाल होता है। यही वजह है कि जब इस रक्षक पेंट को जहाज पर लगाया गया, तो उसका निचला हिस्सा अपने आप लाल हो गया। अब आप सोचेंगे कि आज तो विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है, तो क्या हम किसी और रंग का पेंट नहीं बना सकते?
बिल्कुल बना सकते हैं। आज की आधुनिक तकनीक और रसायनों से एंटी-फाउलिंग पेंट को नीले, काले या हरे किसी भी रंग में बनाया जा सकता है, लेकिन फिर भी लाल रंग का ही सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसका पहला कारण यह है कि लाल रंग समुद्री दुनिया की एक पुरानी और मशहूर परंपरा बन चुका है, जिसे आज भी अपनाया जाता है।
परंपरा के अलावा इसका दूसरा और सबसे अहम कारण सुरक्षा से जुड़ा है। हर कार्गो जहाज के बाहरी हिस्से पर सफेद या पीले रंग से कुछ नंबर और एक खास लाइन बनी होती है, जिसे ‘प्लिमसोल लाइन’ कहते हैं। यह लाइन बताती है कि जहाज में सुरक्षित रूप से कितना माल लादा जा सकता है और पानी के अंदर जहाज कितना डूबा हुआ है।
गहरे लाल रंग के बैकग्राउंड पर सफेद या पीले रंग के ये निशान बहुत साफ और दूर से ही दिखाई देते हैं। इससे बंदरगाह पर काम करने वाले कर्मचारियों को जहाज के ओवरलोड होने का तुरंत पता चल जाता है।

