राष्ट्रवाणी (रायपुर ब्यूरो): प्रतिनिधि, भिलाई। छत्तीसगढ़ी को सिर्फ बोलचाल की बोली नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य, शोध और सांस्कृतिक पहचान की मजबूत भाषा बनाने का सपना लेकर चार दशक से अधिक समय से साहित्य साधना कर रहे दुर्गा प्रसाद पारकर को अब लाला जगदलपुरी राज्य स्तरीय साहित्य पुरस्कार से नवाजा जाएगा।
आंचलिक साहित्य और लोक कविता के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाने वाला यह सम्मान केवल एक रचनाकार की उपलब्धि नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति उनके लंबे समर्पण और संघर्ष की पहचान भी है। ग्राम बेलौदी (मालूद) में जन्मे पारकर ने अपनी लेखनी से छत्तीसगढ़ की माटी, लोकजीवन, परंपराओं और जनमानस को साहित्य में सम्मानजनक जगह दिलाई।
उनकी खासियत यह रही कि उन्होंने केवल साहित्य सृजन ही नहीं किया, बल्कि मातृभाषा को उच्च शिक्षा में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए भी लगातार प्रयास किए। सम्मान को लेकर उनका कहना है कि यह उनके जीवन का सबसे सुखद क्षण होगा। 11 मई 1961 को ग्राम बेलौदी (मालूद), जिला दुर्ग में जन्मे दुर्गा प्रसाद पारकर की शुरुआती पढ़ाई बेलौदी, पैरी, नगपुरा और नेशनल स्कूल दुर्ग में हुई।
इसके बाद उन्होंने सेठ रतनचंद सुराना महाविद्यालय, दुर्ग से उच्च शिक्षा हासिल की। उन्होंने एमकाम और एमए हिंदी की डिग्री ली। छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति के प्रति गहरी रुचि ने उन्हें साहित्य सृजन की ओर मोड़ा।
धीरे-धीरे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, व्यंग्य, लोकसंस्कृति और अनुवाद उनकी रचनात्मक यात्रा का हिस्सा बनते चले गए। पारकर मातृभाषा को किसी भी समाज की असली पहचान मानते हैं। उनका मानना है कि बच्चा जिस भाषा को अपनी मां से सीखता है, वही उसकी मातृभाषा होती है।
जैसे बंगाल की पहचान बांग्ला से है, महाराष्ट्र की मराठी से और तमिलनाडु की तमिल से है, वैसे ही छत्तीसगढ़ की पहचान छत्तीसगढ़ी से है। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ी को राजकीय मान्यता और व्यापक शैक्षणिक प्रतिष्ठा मिलना भाषाई अस्मिता के लिए बेहद जरूरी है। पारकर के साहित्यिक जीवन का सबसे अहम पड़ाव छत्तीसगढ़ी भाषा को उच्च शिक्षा से जोड़ने का उनका प्रयास रहा।
साल 2007 में जब छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिला, उसके बाद उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर इसके अध्ययन की दिशा में ठोस पहल की। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में साल 2013 में एमए छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम शुरू कराने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। इसी वजह से उन्हें एमए छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम के प्रवर्तक के तौर पर जाना जाता है।
उनकी दूसरी बड़ी उपलब्धि यह है कि उनकी साहित्यिक कृतियां विश्वविद्यालयों के सिलेबस में शामिल हुईं। उनका चर्चित उपन्यास ‘बहु हाथ के पानी’ साल 2022 में हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के एमए हिंदी फाइनल ईयर के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। यह उपन्यास शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, बस्तर के पाठ्यक्रम में भी जगह पा चुका है।
उनकी रचनाओं पर कई विश्वविद्यालयों में शोध कार्य भी चल रहे हैं। पारकर का साहित्यिक संसार कई विधाओं में फैला हुआ है। चिन्हारी, लोक-संस्कृति, जस-जंवारा, मया पीरा के संगवारी, सुवा, शिवनाथ, सुकवा, चंदा, सुघ्घर गांव, सुराजी गांव, केंवट कुंदरा और बहु हाथ के पानी उनकी प्रमुख कृतियां हैं।
इन रचनाओं में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, ग्रामीण जीवन, सामाजिक संबंधों और मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण मिलता है। नाटक लेखन में उन्होंने शिवनाथ, सुकवा, चंदा और सुराजी गांव जैसी रचनाओं के जरिए छत्तीसगढ़ी रंगमंच को समृद्ध किया। अनुवाद के क्षेत्र में भी उन्होंने अहम काम किया है।
निर्मला, प्रतिज्ञा, सदामा के चाउर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और चौरी-चौरा की कहानी जैसी कृतियों के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य और ज्ञानपरक विषयों को छत्तीसगढ़ी पाठकों तक पहुंचाया। उनकी रचनाएं अब सिर्फ पाठकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शोध और अकादमिक चर्चा का विषय बन चुकी हैं। कलिंगा विश्वविद्यालय, रायपुर से उनके साहित्य पर पीएचडी पूरी हो चुकी है।
हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग और अन्य विश्वविद्यालयों में भी उनके साहित्य पर शोध कार्य जारी हैं। किसी क्षेत्रीय भाषा के रचनाकार के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। साहित्य सृजन के साथ-साथ उन्होंने लोक मंजरी, छत्तीस लोक और धरोहर जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी किया है।
साल 1992 से 1994 तक छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखन और 1995 से 2000 तक एक समाचार पत्र में ‘चिन्हारी’ स्तंभ के माध्यम से भी उन्होंने अपनी अलग रचनात्मक पहचान बनाई। चार दशकों की इस निरंतर साधना ने ही आज उन्हें राज्य के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान तक पहुंचाया है।

