राष्ट्रवाणी: हरियाणवी गाने आज पूरे देश में पसंद किए जाते हैं, लेकिन हरियाणा की असल संस्कृति यहां के लोकगीतों में देखने …और पढ़ें ससुराल न जाने की जिद के पीछे का मजेदार मतलब (Picture Credit- एआई Generated) खोड़िया गीत हरियाणा की पारंपरिक शादियों का अहम हिस्सा है “कुएं में डूब मर जाऊंगी” गीत ग्रामीण महिलाओं की अभिव्यक्ति है यह गीत घर के कामों के तनाव को हास्य से कम करता है लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली।

बीते कुछ समय से हरियाणा के गाने लोगों की जुबां पर चढ़े हुए हैं। चाहे कोई डांस सॉन्ग हो या सैड रोमांटिक सॉन्ग, सोशल मीडिया पर इन दिनों हरियाणवी गाने धूम मचा रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि असल में हरियाणा का संगीत इन गानों से कई आगे है।

हरियाणा की संस्कृति असल में यहां के लोकगीतों में झलकती है। यहां कुछ ऐसे खास लोकगीत हैं, जो हरियाणा की मिट्टी से जन्मे हैं और अब पूरे देश में पसंद किए जाते हैं। आज हम आपको हरियाणा के ऐसे ही एक गीत के बारे में बताएंगे, जो आमतौर पर शादी- ब्याह के मौके पर गाया जाता है।

पारंपरिक शादियों में संगीत के दौरान अगर महिलाओं का चुलबुला और मजेदार माहौल ना देखने को मिले, तो शादी की रौनक अधूरी-सी लगती है। यह एक खास तरह की रस्म होती है, जिसमें महिलाएं रात के समय ढोलक की तेज थाप, बेफिक्र होकर हंसी-ठिठोली और बेबाक अंदाज में ताने में कसती हैं। हरियाणा की संस्कृति में इस खास रस्म को ‘खोड़िया’ कहा जाता है।

इस मस्ती और उल्लास से भरे माहौल में एक ऐसा मशहूर लोकगीत गाया जाता है, जो वहां मौजूद हर इंसान को मुस्कुराने पर मजबूर कर देता है। हम बात कर रहे हैं ठेठ हरियाणवी बोली में गाए गए गीत- “कुएं में डूब मर जाऊंगी, पर सासरे (ससुराल) नहीं जाऊंगी” की। यह सिर्फ एक साधारण- सा गाना नहीं है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी, उनकी मेहनत और सास-बहू की खट्टी-मीठी नोकझोंक को बयां करने का एक बेहद मजेदर तरीका है।

यह लोकगीत बड़ा ही मजेदार और हास्य से भरा हुआ है। इस गीत में एक नई नवेली दुल्हन अपने मायके में बैठी हुई है और ससुराल वापस जाने से साफ मना कर रही है। ससुराल न जाने के लिए वह इतने नखरे दिखाती है और बढ़ा-चढ़ाकर ससुराल में होने वाली परेशानियों के बारे में बताते हुए कहती है कि ससुराल जाने के बजाय कुएं में कूदकर जान देना ज्यादा पसंद करेगी।

दरअसल, लड़की ऐसा ससुराल में कराए जाने वाले घर के भारी-भरकम कामों से बचने के लिए एक मजाकिया बहाने के तौर पर कहती है। इस गीत की पंक्तियां कुछ इस तरह हैं- हाथ की चाकी पे चून पिसवावे, मोटा-मोटा पीसू तो दलिया बतावे,मैं तो पीस-पीस मर जाऊंगी, पर नहीं सासरे जाऊंगी…” इन पंक्तियों में लड़की कहती है कि ससुराल में हाथ की चक्की से आटा पिसवाते हैं, और अगर थोड़ा मोटा पीस जाए तो उसे दलिया बोलकर ताना मारते हैं।

ऐसे तो मैं आटा-आटा पीस-पीसकर मर जाऊंगी, इसलिए सुसराल नहीं जाऊंगी। “माटी के चूल्हे पे रोटी पुआवे, मैं तो धूमें में अंधी हो जाऊंगी,कुएं में डूब मर जाऊंगी, पर नहीं सासरे जाऊंगी…” इसके बाद लड़की आगे की पंक्तियों में कहती हैं कि ससुराल में मिट्टी के चूल्हे पर रोटियां बनवाते हैं, जिसके धुएं से मैं अंधी हो जाऊंगी।

इसलिए मैं ससुराल नहीं जाऊंगी। सुनने यह गीत भले ही एक नई-नवेली दुल्हन की शिकायत लगती है, लेकिन अगर अगर हम इसके सांस्कृतिक मायने समझें, तो यह कोई विद्रोह या गुस्सा नहीं है। बल्कि, यह ग्रामीण औरतों के लिए अपनी दिन भर की थकान, घरे के काम के बोझ और तनाव को हंसी-मजाक के जरिए दूर करने का एक बेहतरीन जरिया रहा है।

महिलाएं सदियों से ऐसी लोकगीतों के जरिए अपने दिल की बात और अपनी छोटी-मोटी परेशानियां एक-दूसरे से साझा करती आई हैं। बदलते समय के साथ अब ये गीत गांव की मिट्टी से निकलकर सोशल मीडिया की दुनिया पर भी राज करने लगे हैं। यही वजह है कि आज इस हरियाणवी लोकगीत को कई मशहूर गायकों ने नए और ट्रेंडी अंदाज में पेश किया है।

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