राष्ट्रवाणी: नाना पाटेकर (Nana Patekar) ने भारतीय सिनेमा में हीरो से लेकर खलनायक और कॉमिक रोल तक किए हैं। वे एक …और पढ़ें नाना पाटेकर ने निभाए अलग-अलग तरह के किरदार ‘अंकुश’ से लेकर ‘संकल्प’ तक की दास्तां शक्ति शालिनी है नाना पाटेकर की आखिरी फिल्म विनोद अनुपम, पटना।
हमारे बाद अब महफिल में अफसाने बयां होंगे, बहारें हम को ढूंढेंगी, न जाने हम कहां होंगे! फिल्म तरकीब में इंस्पेक्टर जसराज सिंह बने नाना पाटेकर ने जब यह डायलॉग बोला था, तब अंदाज अलग था। आज जब नाना पाटेकर हम सबको अलविदा कह चुके हैं तो इस संवाद की तासीर एकदम अलग है।
उस अलग आवाज, अंदाज और व्यक्तित्व को याद करता आलेख… आज हम जेन जी (Gen-Z) की बात करते हैं, एन चंद्रा की ‘अंकुश’ 1985 में जेन जी की बात करते हुए प्रतिनिधि की तौर पर दिखता था, एक लंबा, पतला, दुबला, गुस्सैल नौजवान, जिसकी आंखें बोलती थीं। उस समय के जाने-पहचाने चेहरे सत्यजीत और राजा बुंदेला के बावजूद वहां कोई याद रह गया तो वे थे नाना पाटेकर।
नाना पाटेकर (Nana Patekar) वास्तव में अभिनेता दिखते ही नहीं थे, उनके अभिनय की यह विशेषता ‘अंकुश’ (Ankush) से शुरू हुई तो निरंतर सशक्त होती गई। एन. चंद्रा की ही अगली फिल्म ‘प्रतिघात’ में, हो सकता है आप सब कुछ भूल गए हों, उस अर्ध विक्षिप्त रिटायर्ड हवलदार को नहीं भूल सकते, जिसकी ताकत उसके हाथों में थामे तिरंगे में होती है।
नाना पाटेकर के अभिनय की शुरुआत हालांकि 1978 में ही मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ के साथ हो गई थी, लेकिन उनके अभिनय को धार ‘अंकुश’ से ही मिली, जिसके बाद उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। हिंदी सिनेमा के परंपरागत अभिनय से अलग अपने अभिनय को उन्होंने अलग पहचान दी, जहां किरदार को वे इतना विराट कर देते थे कि अभिनेता छोटा हो जाता था।
शायद उनके अभिनय की इसी विशेषता ने विधु विनोद चोपड़ा को अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘परिंदा’ (Parinda) के सबसे अहम किरदार में लेने को तैयार किया। अन्ना सेठ के रूप में उन्होंने भारतीय सिनेमा में खलनायक की परिभाषा ही बदल दी। एक क्रूर, हिंसक और मानसिक रूप से जटिल व्यक्तित्व का जिस कुशलता से निर्वहन किया, वह शायद हिंदी दर्शकों ने पहले नहीं देखा था।
उनकी तीखी डायलॉग डिलीवरी, चुभती तीखी निगाहें, नियंत्रित शारीरिक हाव-भाव और अप्रत्याशित प्रतिक्रियाएं अन्ना के चरित्र को असाधारण बनाती हैं। उन्होंने खलनायक को केवल हिंसक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक जटिलताओं से भरे इंसान के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे यह भूमिका और अधिक प्रभावशाली बन गई।
आज भी अन्ना का कैरेक्टर गब्बर सिंह की तरह हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायकों में शामिल किया जाता है। लेकिन नाना ठहरे नहीं, कुछ अलग करने की बेचैनी के चलते मुख्यधारा से अलग ‘तृषाग्नि’ जैसी फिल्म भी उनकी प्राथमिकता में शामिल रही, जहां वे अपने स्वाभाविक अभिनय से एकदम विपरीत दिख रहे थे।
इस दौर में उन्होंने ऐसे विविध और चुनौतीपूर्ण किरदार निभाए, जिन्होंने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में स्थापित किया। उनकी एक्टिंग में किरदार के साथ पूर्ण आत्मसात होने की क्षमता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। नाना पाटेकर के लिए वास्तव में अभिनय मात्र अभिनय नहीं था, उनकी पूरी जीवन यात्रा को देखें तो वहां समाज के प्रति कुछ करने का जज्बा प्रबल दिखता रहा है।
सफलता के शिखर पर भी उन्होंने वही फिल्में कीं, वही किरदार निभाए, जो समाज से कुछ संवाद कर रहे थे। आश्चर्य नहीं कि 1991 में अपने निर्देशन में ‘प्रहार-द फाइनल अटैक’ (Prahaar) लेकर आए। जिसमें उन्होंने एक अनुशासित सैन्य अधिकारी की भूमिका निभाई, जिसने समाज में व्याप्त अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश दिया।
‘प्रहार’ एक ऐसे सेवानिवृत सैन्य अधिकारी की कहानी है, जो समाज में फैले भ्रष्टाचार, अपराध और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करता है। फिल्म में अनुशासन, राष्ट्रप्रेम, नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषयों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ नाना प्रस्तुत करने में सफल हुए थे। हालांकि नाना के निर्देशन का सफर आगे नहीं बढ सका।
अपने किरदारों के चयन में नाना जैसी जिद दुर्लभ दिखती है, क्रांतिवीर में उनके द्वारा निभाया गया प्रताप नारायण तिलक का किरदार भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली पात्रों में गिना जाता है। इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ। अग्निसाक्षी में उन्होंने एक सनकी और हिंसक पति की भूमिका निभाकर अभिनय की बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया।
इस फिल्म में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। इसके साथ वजूद शक्ति: द पावर अब तक छप्पन अपहरण और वेलकम (Welcome) जैसी फिल्मों में उन्होंने गंभीर, नेगेटिव, संवेदनशील और कॉमेडी- हर प्रकार के किरदारों को प्रभावशाली ढंग से निभाया। विशेष रूप से अब तक छप्पन में ईमानदार पुलिस अधिकारी और वेलकम में उदय शेट्टी के कॉमिक किरदार ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया तथा उनकी एक्टिंग-स्किल के नए आयाम प्रस्तुत किए।
नाना पाटेकर मराठी भाषी थे और अपनी मराठी पहचान को उन्होंने साथ रखा। जब भी अवसर मिला, अपने अभिनय से उन्होंने मराठी फिल्मों को भी नई पहचान दी। 2016 में बनी मराठी फिल्म नटसम्राट नाना के अभिनय के कारण कालजयी फिल्मों में शामिल की जाती है।
नटसम्राट में उन्होंने रंगमंच के महान अभिनेता गणपत रामचंद्र बेलवलकर की भूमिका निभाई। इस फिल्म में वृद्धावस्था, पारिवारिक रिश्तों, अकेलेपन और आत्मसम्मान की पीड़ा को उन्होंने जिस तरह अभिनीत किया, लगा बेलवलकर जी को साकार देखा जा रहा हो। समय के साथ ओटीटी प्लेटफार्म (OTT) पर आई उनकी संकल्प (Sankalp) में भी नाना राजनीति के एक अनोखे चेहरे को दिखाते नजर आए।
आगामी रिलीज शक्ति शालिनी उनकी अपने दर्शकों को अंतिम प्रस्तुति होगी। नाना पाटेकर स्वभाव से राष्ट्रवादी थे, उनकी प्राथमिकता में देश, देश के लोग थे। जिसे जीवनभर उन्होंने समृद्ध करने की कोशिश की, जब अवसर मिला अभिनय से किया, जब आवश्यकता देखी तो स्वयं देश के लिए खड़े दिखे।
नाना के यही सामाजिक सरोकार थे कि न तो उनका अभिनय भूला जा सकता है, न ही उनका विराट व्यक्तित्व, जो हर जरूरतमंद के लिए एक उम्मीद की तरह था।
