राष्ट्रवाणी: रोहित कश्यप, मुंगेली। जिला कलेक्ट्रेट परिसर में आज बड़ी संख्या में गाय का पहुंचना एक सामान्य घटना नहीं, बल्कि एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करता नजर आया। कलेक्ट्रेट के गार्डन में पहुंची गाय काफी देर तक हरी घास चरती रही और इसके बाद कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार के पास जाकर खड़ी हो गई।

पूरा दृश्य ऐसा लग रहा था, मानो गाय खुद अपनी फरियाद लेकर प्रशासन के दरवाजे पहुंची हो और कह रही हो—“साहब! हमारी पीड़ा भी सुनिए…”। गाय का कलेक्ट्रेट परिसर में पहुंचना भले ही पहली नजर में सामान्य घटना लगे, लेकिन इसके पीछे घूमंतू पशुओं की वह समस्या छिपी है, जिससे इन दिनों शहर से लेकर गांव और सड़कों से लेकर खेतों तक लोग परेशान हैं।

सड़कों पर बड़ी संख्या में घूमते पशु कभी यातायात के लिए परेशानी बन रहे हैं तो कभी खुद दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। तो कभी लोग इसके चलते घटना के शिकार हो रहे हैं। वहीं, किसानों के खेतों में घुसकर ये पशु फसलों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को अगर गाय की ‘जुबानी’ समझा जाए तो शायद उसकी शिकायत कुछ ऐसी ही हो—“जब तक दूध दिया, तब तक उपयोगी रही… लेकिन दूध देना बंद किया तो क्या मैं अनुपयोगी हो गई?” आज स्थिति यह है कि कई पालतू पशु घरों से निकलकर सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं। दूध देने की क्षमता कम होने या पूरी तरह समाप्त होने के बाद कुछ पशुपालकों द्वारा पशुओं को खुले में छोड़ देने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।

इसका खामियाजा पशु खुद भी भुगत रहे हैं और आम लोगों, वाहन चालकों तथा किसानों को भी परेशानी उठानी पड़ रही है। गाय के लिए भारतीय समाज में आस्था और संवेदना का विशेष स्थान है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गाय कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर कैसे पहुंच गई, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि जो पशु कभी किसी घर का हिस्सा था, वह आज सड़कों पर भटकने के लिए क्यों मजबूर है?

मुंगेली जिले में घूमंतू पशुओं की समस्या का असर कई स्तरों पर दिखाई दे रहा है। सड़कों पर बैठे या अचानक सड़क पार करते पशुओं के कारण वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा बना रहता है। कई बार तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आने से पशु घायल होते हैं या उनकी मौत तक हो जाती है।

तो कई बार राहगीर उससे टकराकर काल के गाल में समा जा रहे हैं। दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपने खेतों में खड़ी फसल को बचाने के लिए परेशान हैं। खुले में घूमने वाले पशुओं के झुंड खेतों में पहुंचकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।

किसानों द्वारा इस समस्या को लेकर प्रशासन के समक्ष शिकायतें भी की जा चुकी हैं और उनसे निजात दिलाने की मांग उठती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर समस्या का स्थायी समाधान अभी नजर नहीं आ रहा है। जिले में घूमंतू पशुओं की समस्या से निजात दिलाने के लिए करीब दर्जन भर गौधाम स्वीकृत होने की बात सामने आती रही है।

हालांकि, इनमें एक-दो स्थानों को छोड़ दिया जाए तो कई जगह अपेक्षित संचालन और गतिविधियां नजर नहीं आने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि गौधाम स्वीकृत हैं, तो सड़कों पर घूमते पशुओं की संख्या कम क्यों नहीं हो रही? यदि गौधाम की व्यवस्था कागजों से निकलकर जमीन पर प्रभावी तरीके से संचालित हो, पशुओं के लिए पर्याप्त स्थान और देखरेख की व्यवस्था हो तथा पशुपालकों की जिम्मेदारी भी तय हो, तो इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

घूमंतू पशुओं की समस्या के लिए केवल प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना भी पूरी तस्वीर नहीं है। पशुपालकों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जिस पशु को घर में पालकर उसका दूध और अन्य उपयोग लिया गया, उसे बाद में सड़क पर छोड़ देना न तो पशु के प्रति संवेदनशील व्यवहार है और न ही समाज के प्रति जिम्मेदारी।

वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी है कि सड़कों पर घूमते पशुओं की रोकथाम के लिए प्रभावी व्यवस्था करे, गौधामों का वास्तविक संचालन सुनिश्चित करे और पशुपालकों द्वारा पशुओं को खुले में छोड़ने की स्थिति में नियमों के तहत कार्रवाई तथा जागरूकता दोनों पर काम करे। कलेक्ट्रेट के गार्डन में हरी घास चरने के बाद कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार के पास खड़ी गाय को देखकर ऐसा लगा, मानो वह प्रशासन के सामने अपनी पीड़ा रखने आई हो।

मानो कह रही हो “साहब… मैं सिर्फ दीपावली के दिन पूजने के लिए नहीं हूं। मैं सिर्फ दूध देने तक उपयोगी नहीं हूं। मैं सड़क पर भटकने के लिए नहीं, सुरक्षित रहने के लिए भी हूं।

मेरी पीड़ा सुनिए… मुझे अनुपयोगी समझकर यूं ही मत छोड़िए।” कलेक्ट्रेट परिसर में पहुंची इस गाय ने शायद कोई लिखित शिकायत नहीं दी, लेकिन उसका वहां तक पहुंचना अपने आप में घूमंतू पशुओं की समस्या पर एक मौन सवाल जरूर छोड़ गया है। अब देखना यह होगा कि इस ‘मौन फरियाद’ को प्रशासन और समाज किस रूप में सुनता है और सड़कों पर भटकते पशुओं तथा किसानों की फसल को नुकसान पहुंचाने वाली इस समस्या के समाधान के लिए जमीनी स्तर पर क्या कदम उठाए जाते हैं।

राष्ट्रवाणी एक डिजिटल समाचार एवं जनचर्चा मंच है, जिसका उद्देश्य विश्वसनीय पत्रकारिता, सार्थक राष्ट्रीय विमर्श और जनहित से जुड़े मुद्दों को प्रभावशाली तरीके से समाज के सामने प्रस्तुत करना है।

हम मानते हैं कि पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने, लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत बनाने और राष्ट्र निर्माण की दिशा में सकारात्मक सोच विकसित करने का दायित्व भी है। “राष्ट्र प्रथम” की भावना के साथ राष्ट्रवाणी देश, समाज, शासन, अर्थव्यवस्था, कृषि, तकनीक, संस्कृति और जनसरोकारों से जुड़े विषयों को गहराई और तथ्यात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करता है।

संपादक : नीरज दीवान

मोबाइल नंबर : 7024799009

© 2026 ThemeSphere. Designed by ThemeSphere.
Exit mobile version