राष्ट्रवाणी: How To Prevent Metal Cooler From Rusting: पानी हमारी सेहत के लिए बेहद जरूरी है और इसलिए सिर्फ साफ दिखने वाला पानी पीना ही पर्याप्त नहीं माना जाता. पानी की क्वालिटी जांचने के लिए कई लोग टीडीएस यानी टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स की जांच करते हैं. टीडीएस की मदद से पानी में घुले हुए मिनरल्स, लवण, धातु और दूसरे घुले पदार्थों की कुल मात्रा का अंदाजा लगाया जाता है. यह पदार्थ आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन पानी के स्वाद और उसकी क्वालिटी पर असर डाल सकते हैं. टीडीएस को आमतौर पर पीपीएम यानी पार्ट्स पर मिलियन में मापा जाता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी पानी का टीडीएस 100 पीपीएम है, तो इसका मतलब है कि एक लीटर पानी में करीब 100 मिलीग्राम घुले हुए ठोस पदार्थ मौजूद हैं. इनमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोडियम, बाइकार्बोनेट, क्लोराइड और सल्फेट जैसे पदार्थ शामिल हो सकते हैं. पीने के पानी का कितना होना चाहिए TDS?
आमतौर पर 50 से 150 पीपीएम के बीच टीडीएस वाले पानी को स्वाद और मिनरल कंटेंट के लिहाज से अच्छा माना जाता है. हालांकि, सिर्फ टीडीएस की एक संख्या देखकर पानी को पूरी तरह सुरक्षित या असुरक्षित नहीं कहा जा सकता. पानी में कौन से पदार्थ घुले हैं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है. 50 से 300 पीपीएम के बीच टीडीएस वाला पानी कई मामलों में पीने के लिए स्वीकार्य हो सकता है. वहीं 300 से 500 पीपीएम तक का टीडीएस भी कई परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन पानी के स्रोत और उसमें मौजूद अन्य पदार्थों की जांच जरूरी है. 500 पीपीएम से ऊपर टीडीएस होने पर पानी की क्वालिटी की जांच कराना और जरूरत के अनुसार ट्रीटमेंट कराना बेहतर होता है. 50 पीपीएम से कम TDS वाला पानी कैसा होता है?
अगर पानी का टीडीएस 50 पीपीएम से कम है, तो उसमें घुले हुए मिनरल्स की मात्रा कम हो सकती है. ऐसे पानी का स्वाद कुछ लोगों को फीका या फ्लैट लग सकता है. आरओ जैसे कुछ प्यूरीफिकेशन सिस्टम पानी से बड़ी मात्रा में घुले हुए पदार्थ निकाल देते हैं, जिससे टीडीएस काफी कम हो सकता है. हालांकि, कम टीडीएस का मतलब अपने आप यह नहीं है कि पानी खराब या सेहत के लिए नुकसानदायक है. पानी की पूरी क्वालिटी जानने के लिए दूसरे मानकों की भी जांच जरूरी होती है. 50 से 150 पीपीएम TDS क्यों माना जाता है अच्छा?
50 से 150 पीपीएम के बीच टीडीएस वाले पानी में कुछ जरूरी मिनरल्स मौजूद हो सकते हैं और इसका स्वाद भी आमतौर पर अच्छा माना जाता है. कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स शरीर के लिए जरूरी होते हैं. यही वजह है कि बहुत कम टीडीएस वाले पानी की तुलना में संतुलित मिनरल कंटेंट वाला पानी ज्यादा पसंद किया जाता है. लेकिन इसे हर व्यक्ति और हर जगह के लिए एक निश्चित स्वास्थ्य सीमा नहीं माना जाना चाहिए. पानी की सुरक्षा उसके स्रोत और उसमें मौजूद प्रदूषकों पर भी निर्भर करती है. 150 से 300 पीपीएम के बीच टीडीएस वाला पानी भी कई जगहों पर सामान्य रूप से पाया जाता है. इसमें घुले हुए मिनरल्स की मात्रा 50 से 150 पीपीएम वाले पानी की तुलना में ज्यादा हो सकती है. अगर पानी में कोई हानिकारक प्रदूषक मौजूद नहीं है, तो केवल इस टीडीएस रीडिंग के आधार पर उसे खराब नहीं कहा जा सकता. 300 से 500 पीपीएम तक का टीडीएस पानी के स्वाद को थोड़ा प्रभावित कर सकता है. पानी का स्वाद कुछ लोगों को भारी या अलग लग सकता है. ऐसे पानी के मामले में सिर्फ टीडीएस देखने के बजाय उसके स्रोत और दूसरी क्वालिटी पैरामीटर्स की भी जांच करना जरूरी है. 500 पीपीएम से ज्यादा TDS होने पर क्या करें?
अगर घर के पानी का टीडीएस 500 पीपीएम से ऊपर आ रहा है, तो पानी की जांच कराना बेहतर रहेगा. ज्यादा टीडीएस का मतलब यह जरूरी नहीं कि पानी में कोई खतरनाक पदार्थ ही मौजूद है, क्योंकि टीडीएस में कई सामान्य मिनरल्स और लवण भी शामिल होते हैं. फिर भी लगातार ज्यादा रीडिंग मिलने पर पानी की पूरी जांच कराना समझदारी है. बहुत ज्यादा टीडीएस वाले पानी में नमकीन, कड़वा या धातु जैसा स्वाद आ सकता है. इसके अलावा ऐसे पानी के इस्तेमाल से गीजर, केतली और दूसरे उपकरणों में मिनरल्स की परत जमने की समस्या भी हो सकती है. घर पर पानी का टीडीएस जांचने के लिए डिजिटल टीडीएस मीटर इस्तेमाल किया जा सकता है. साफ गिलास में पानी लें और मीटर को उसमें डालें. कुछ सेकंड में स्क्रीन पर टीडीएस की रीडिंग दिखाई देगी. अगर रीडिंग अचानक पहले की तुलना में काफी बदल जाए, तो पानी के स्रोत या फिल्ट्रेशन सिस्टम की जांच करानी चाहिए. सिर्फ टीडीएस मीटर की रीडिंग को पानी की सुरक्षा का अंतिम प्रमाण नहीं मानना चाहिए. क्या TDS कम करने के लिए RO जरूरी है?
हर पानी के लिए आरओ जरूरी नहीं होता. अगर पानी में टीडीएस ज्यादा है या उसमें कुछ खास घुले हुए प्रदूषक मौजूद हैं, तो आरओ उपयोगी हो सकता है. वहीं कुछ मामलों में यूवी, यूएफ या दूसरे फिल्ट्रेशन सिस्टम जरूरत के मुताबिक बेहतर विकल्प हो सकते हैं. इसलिए पानी के लिए प्यूरीफायर चुनने से पहले उसकी जांच कराना ज्यादा सही तरीका है. सिर्फ टीडीएस देखकर मशीन चुनना जरूरी नहीं है. जर्नलिज्म की दुनिया में करीब 15 साल बिता चुकीं सोनम की अपनी अलग पहचान है. वह खुद ट्रैवल की शौकीन हैं और यही वजह है कि अपने पाठकों को नई-नई जगहों से रूबरू कराने का माद्दा रखती हैं. लाइफस्टाइल और हेल्थ जैसी बीट्स में उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल रीडर्स का ध्यान खींचा है, बल्कि अपनी विश्वसनीय जगह भी कायम की है. उनकी लेखन शैली में गहराई, संवेदनशीलता और प्रामाणिकता का अनूठा कॉम्बिनेशन नजर आता है, जिससे रीडर्स को नई-नई जानकारी मिलती हैं. लखनऊ यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में ग्रैजुएशन रहने वाली सोनम ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत भी नवाबों के इसी शहर से की. में उन्होंने बतौर इंटर्न अपना करियर शुरू किया. इसके बाद के आईनेक्स्ट में भी उन्होंने काफी वक्त तक काम किया. फिलहाल, वह एबीपी लाइव वेबसाइट में लाइफस्टाइल डेस्क पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही हैं. ट्रैवल उनका इंटरेस्ट एरिया है, जिसके चलते वह न केवल लोकप्रिय टूरिस्ट प्लेसेज के अनछुए पहलुओं से रीडर्स को रूबरू कराती हैं, बल्कि ऑफबीट डेस्टिनेशन्स के बारे में भी जानकारी देती हैं. हेल्थ बीट पर उनके लेख वैज्ञानिक तथ्यों और सामान्य पाठकों की समझ के बीच बैलेंस बनाते हैं. सोशल मीडिया पर भी सोनम काफी एक्टिव रहती हैं और अपने आर्टिकल और ट्रैवल एक्सपीरियंस शेयर करती रहती हैं. We use cookies to improve your experience, analyze traffic, and personalize content. By clicking “Allow All Cookies”, you agree to our use of cookies.
